उरई। जनपद में बेसिक शिक्षा की व्यवस्था शिक्षकों के स्कूल न पहुंचने से लड़खड़ा गई है। कोंच तहसील को केंद्र बनाकर किये गये सर्वें में दर्जनों स्कूलों के बंद रहने का खुलासा हुआ। वैसे तो बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी ऐसी शिकायतें सत्य पाये जाने पर संबंधित शिक्षकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कह रहे हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि सच्चाई यह है कि विभागीय अधिकारियों को नाकारा शिक्षकों से फीलगुड होता है जिसकी वजह से वे उनकी अनुपस्थिति पर कोई कार्रवाई नही करते।
बताया जाता है कि परिषदीय विद्यालयों में दाखिला लिए बच्चे शिक्षा की आस में शिक्षकों की बाट जोहते रहते हैं। लेकिन पढ़ाई तो दूर उनके स्कूल नियमित रूप से खुलते तक नही हैं। मजबूरी में अभिभावकों को प्राइवेट तौर पर संचालित हो रहे बिना मान्यता के स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराना पड़ता है। तांकि उनका भविष्य बर्बाद होने से बच सके।
जब सरकारी स्कूलों की हकीकत जानने के लिए यह संवाददाता चमरउवा गांव के प्राथमिक विद्यालय पहुंचा तो वहां ताला जड़ा मिला। जब वहां के बच्चों से बात की तो उन्होंने बताया कि यह विद्यालय महीने में दो-चार बार ही खुलता है। ऐसा ही कुछ ग्राम खाबरी के प्राथमिक विद्यालय में देखने को मिला। जहां तैनात अध्यापकों में कोई भी विद्यालय में मौजूद नही था। ग्रामीणों ने बताया कि इस विद्यालय में न तो पढ़ाई होती है और न ही मिडडे मील बनता है। ग्राम कुदारी के प्राथमिक विद्यालय में तैनात अध्यापिका नेहा एवं अध्यापक कन्हैया लाल दोनों ही लोग सर्वे के समय गैर हाजिर थे और यह विद्यालय व इसके बच्चे जूनियर विद्यालय के सहायक अध्यापक आशीष साहू के हवाले थे। जूनियर के अध्यापक से प्राथमिक विद्यालय में बैठे होने की वजह पूंछी तो उन्होंने बताया कि हम लोग ऐसे ही एक-दूसरे का काम चलाते हैं।
जब इन प्रकरणों के बाबत बेसिक शिक्षाधिकारी राजेश शाही से बात की गई तो उन्होंने वही रटा-रटाया जांच कर कार्रवाई करने का वायदा करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। शायद इस जबाब को उच्चाधिकारी अमल में लाते तो आज सरकारी विद्यालयों की ऐसी स्थिति नही होती। अब देखना होगा कि यूपी सरकार ऐसे गैर जिम्मेदार शिक्षकों और आंखे बंद किये बैठे शिक्षाधिकारियों पर कोई कार्रवाई करती है या फिर सब यूं ही चलता रहेगा और देश का भविष्य कहे जाने वाले नौनिहालों की बर्बादी होती रहेगी।

Leave a comment