हमीरपुर जिले के मुस्करा खुर्द गांव में भाजपा की महिला विधायक के महिलाओं के लिए निषिद्ध एक मंदिर में चले जाने के बाद उसकी पवित्रता पुर्नप्रतिष्ठापित करने के लिए किया गया कर्मकांड चर्चा का विषय बना हुआ है। दलित समुदाय के लोग इसे महिलाओं के प्रति दूषित दृष्टिकोण मात्र के नजरिये से न देखकर अपनी अस्मिता से जोड़ रहे हैं क्योंकि राठ की जिन महिला विधायक मनीषा अनुरागी को लेकर यह विवाद हुआ वे दलित हैं। दलितों के गर्म दल इसलिए मनीषा अनुरागी के खिलाफ भी भड़के हुए हैं। उनका कहना है कि दलितों को अपमानित करने की संस्कृति को बढ़ावा दे रही पार्टी के प्रति उन जैसे हमारे समाज के लोगों की ललक की वजह से आज भी उन्हें नीचा दिखाने के षड़यत्र सफल हो रहे हैं।
हार्डकोर दलितों की इस दलील को पूरी तरह गलत भी नही कहा जा सकता। अध्यात्म हर मनुष्य को ईश्वर की संतान के रूप में दिखाता है इसलिए इसमें भाषा, जाति व नस्ल के आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश नही होनी चाहिए। लेकिन भारत में अध्यात्म को धर्म के बतौर इस तरह संस्थाबद्ध किया गया जिससे मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊंच-नीच और भेदभाव को बढ़ावा मिला। इसी क्रम में स्त्री और दलितों को हेय और अपवित्र मानने की ग्रंथि का पोषण सदियों तक हुआ। दलित ही नही समूचे शूद्र समाज को एक सजायाफ्ता समाज के रूप में इसमें दर्शाया गया है जो पूर्व जन्म किये गये अपने अपराधों के कारण वंचित और उपेक्षित रहने के लिए बाध्य है। मनुष्य के पाशविकता की हद तक दमन की मानसिकता समाज निर्माण की प्रक्रिया के अपशिष्ट के रूप में सभ्यताओं के पिछले दौर में जन्म लेती और बढ़ती रहीं। लेकिन प्रगति के शु़़द्धीकरण से सभ्यताओं के यह मटमैले जाले काफी हद तक सारे संसार मे हट गये हैं या हट रहे हैं।
सामंती दौर था तब बहुतायत लोगों को जंगली तरीकों से सर्वहारा बनाये रखना चंद लोगों के ऐशोआराम उनसे बेगारी कराने हेतु जरूरी समझा गया था। लेकिन मशीनीकरण का युग आते-आते यह दृष्टिकोण त्याज्य हो गया। अधिक उत्पादन की स्थितियां बन जाने से लोगों को सर्वहारा रखने की बजाय उनमें से ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता यानी सरप्लस आमदनी में सक्षम लोग तैयार करने की कसरत चल पड़ी। इस क्रम में मजदूरों के मेहनताने में सुधार किया गया। उनके लिए गरिमा के साथ जीने के लिए अवसर तैयार किये गये। उन्हें जीवन स्तर बढ़ाने के लिए उत्साहित किया गया। इस बदलाव का ही नतीजा था कि औद्योगिक रूप से विकसित देशों में सर्वहारा की क्रांति का माक्र्स का फार्मूला फेल हो गया। भारत जब आजाद हुआ तो यहां पर बहुतायत जनता सर्वहारा की कोटि मे थी। गरीबी हटाने के संसाधन तो देश में पर्याप्त उपलब्ध थे लेकिन मेहनतकश आवाम तक संसाधन पहुंच गये तो बेगारी करने के लिए कौन मिलेगा इस मानसिकता के तहत अतिरिक्त धन के सकारात्मक निवेश की बजाय उसे जमीन में गाड़कर अवरुद्ध कर दिया जाता था। आजादी के कई दशक तक लोगों को मकान आदि के लिए खुदाई के समय जमीन के अंदर छुपे ये खजाने मिलते रहे। इस बीच यहां भी बाजार आ गया। जिससे दोबारा यह खजाने जमीन के अंदर दफन होने के लिए पहुंचने का सिलसिला बहाल न हो सका। भ्रष्टाचार ने जाने-अनजाने में बाजार की बड़ी मदद की। जिससे जड़ों तक तेजी के साथ पैसा पहुंचा और सर्वहारा वर्ग के उपभोक्ता के रूप में उत्थान की प्रक्रिया को बल मिला। सामंती दौर के दमन, उत्पीड़न की कहानियों का भी इस सिलसिले के साथ अंत होता गया।
बुर्जुआ लोकतंत्र, स्वशासन, समता, स्वतंत्रा और बंधुत्व के मूल्यों की सर्वोच्चता इस युग में सार्वभौम मान्यतायें बन गईं। इस्लामिक देशों तक में आधुनिक तरीके से चुनाव की शुरूआत हो गयी। यह बदलाव इस बात का गवाह बना कि तथागत बुद्ध ने किसी समय ठीक ही कहा था कि इस दुनियां में कुछ भी सनातन नही है। समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। लेकिन प्रतिक्रियावाद के कारण बुद्ध के अनित्यवाद का लाक्षणिक विरोध करने के लिए यहां व्यवस्था को सनातन नाम दे दिया गया और उसी के मुताबिक अपनी मानसिकता गढ़ ली गई।
भारत में एक बड़ा वर्ग चाहे जितनी सांस्कृतिक पुरातनता की बात करे लेकिन इसने भी इसमें से बहुत कुछ को आप्रासंगिक मानकर खारिज किया है। क्योंकि आप बुद्धिविलास के लिए कुछ भी कह और लिख सकते हैं। पर आपकी करनी भौतिक वास्तविकताओं के अनुरूप ही होगी। कठोर शब्दों में कहें तो प्रगति के साथ इस देश में भी लोगों को यह अहसास हुआ कि पुराने समय में संस्कृति के नाम पर बहुत कुछ बर्बरता भी होती रही थी जो आज स्वीकार्य नही हो सकती। लेकिन हाल में देश में हाल में जो राजनैतिक परिवर्तन हुए उनके कारण प्रगति प्रतिगामी प्रस्थान में बदल गई।
यह सही हो सकता है कि यहां के लोग भले ही वे किसी जाति वर्ग के हों अपने सांस्कृतिक परिवेश की वजह से इस्लामिक तौर-तरीकों को आसानी से गले के नीचे उतारने को तैयार नही थे। जिसकी वजह से धर्म परिवर्तन पर आमादा बाहर से आये शासकों ने अपने उददेश्य के लिए क्रूरता का सहारा लिया। इतिहास की इन स्मृतियों की वजह से इसको कहीं फिर ने दोहराया जाने लगे इसका डर आज भी यहां के लोगों को पीछा करता रहता है। इसलिए हिंदू समाज में वह शूद्र जोे लोकतंत्र की हवा लगने के बाद यहां की परंपरागत समाज व्यवस्था के खिलाफ बगावत की हुंकार भरने लगा था। पिछले चुनाव में उसका भी अपनी कसक भूलकर इस्लाम के हौवे के नाम पर भाजपा के पक्ष में धुव्रीकरण हो गया। लेकिन आपातकालीन मानसिकता से उबरने के बाद सामान्य स्थितियां फिर बन जाने पर जातिगत अपमान की कसक फिर नही उभरेगी ऐसा सोचा जाना मूर्खता थी। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि समता, स्वतंत्रा और वैधता पर आधारित समाज व्यवस्था को आज सार्वभौम्य मान्यता प्राप्त है जिससे भारतीय समाज भी आप्लावित है। इसलिए होना तो यह चाहिए था कि हिंदू समाज को इसके अनुरूप पुनः समंजित किया जाता। लेकिन भेदभाव और अन्याय पर आधारित धार्मिक मान्यताओं का पुनरूत्थान इसमें एक बड़ी बिडंबना बनकर सामने आया है। बाबा साहब डा. अंबेडकर को आजादी के पहले एक बार लाहौर में हिंदू सम्मेलन को संबोधित करने के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था लेकिन बाद में उनका आमंत्रण रदद कर दिया गया था। उस कार्यक्रम के लिए उन्होंने जो भाषण तैयार किया था बाबा साहब ने बाद में उसको प्रकाशित कराकर लोगों के बीच वितरित कराया जिसमें एक बड़े मार्के की बात थी। उसका सार यह था कि हिंदू धर्म में कुछ मौलिक नही है जिससे यह अराजक धर्म हो गया है जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। इसलिए इसके मौलिक ग्रंथ, स्मृतियां और संहिताएं सूचीबद्ध कर दिये जायें तांकि मनमानेपन और भटकाव से इसे बचाया जा सके। भाजपा ने कई साध्वियों को सांसद और विधायक चुनवाया है। लेकिन स्त्री के सन्यास की अनुमति या व्यवस्था किस हिंदू संहिता में है या इसकी पौराणिक या उपनिषदीय नजीरों के बारे में पूंछा जाये तो हो सकता है कि अच्छे-अच्छे हिंदू धर्म के स्वयं-भू विशेषज्ञो के बगलें झांकने की नौबत आ जाये। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णु यानी भगवान के केवल 24 अवतार दुनियां में लिखे गये हैं जिनमें से 23 हो चुके हैं 24वां अवतार कौन होगा श्रीमदभागवत में इसका भी संकेत है। जो न आसाराम बापू के व्यक्तित्व से मिलता है और न ही राम रहीम से। फिर हर ऐरा-गैरा नत्थू खैरा हिंदुओं के बीच अवतार के रूप में कैसे पुज उठता है यह अराजकता नही तो या है। सियाराम मय सब जग जानी, करहु प्रनाम जोर जुग पानी जिस धर्म में इस चैपाई को सुनाया जाता हो उसमें किसी को अछूत कैसे किया जाना संभव है। जनेऊ और तिलक को कुछ ही वर्गों तक सीमित किया जाना कैसे अनुमन्य हो सकता है। क्योंकि चाहे वह सवर्ण हो या अवर्ण उक्त चैपाई की मान्यता के मुताबिक सियाराम यानी ईश्वर एक जैसे सभी में बसे हुए हैं। मनुष्य-मनुष्य के बीच अंतर करना इस सूत्र का विरोधाभाषी है। इसी तरह स्त्रियों या दलितों के मंदिर में प्रवेश के निषेध की व्यवस्था भी मौलिक नही है। कुछ लोगों ने धर्म में व्यापारिक दृष्टिकोण की मिलावट की वजह से अपने स्थान की अलग पहचान बनाने के लिए यह नियम चला दिये और किसी ने इसका प्रतिवाद नही किया।
बहरहाल हमीरपुर जिले में जो हुआ वह अंध धार्मिक पुनरूत्थान से सामाजिक बिखराव के बड़े अंदेशे की ओर इशारा करता है। इस घटना से के कारण भारतीय समाज की आधुनिक प्रगति की साख को धक्का पहुंचा है। हिंदू धर्म की बदनामी हुई है। भारत के अपने सांस्कृतिक परिवेश की सुकुमारता की वजह से अस्तित्व को बचाये रखने की चिंता होना एक अलग पहलू है और सार्वभौम्य मानवीय मूल्यों की झलक पूरी उज्जवलता के साथ समाज व्यवस्था में समाविष्ट करना यह पहलू अलहदा है। लेकिन यह भी लाजिमी तौर पर गौर करने योग्य पहलू है। वर्तमान कर्णधारों के लिए जरूरी है कि वे इस संतुलन को बनाने में अपने कौशल का प्रदर्शन करें।

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