कह नही सकते कि जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की गई थी उस समय अमित शाह का राजनीतिक वजूद कितना था। यह जिज्ञासा इसलिए कि अमित शाह और राहुल गांधी में वाक युद्ध छिड़ा है जिसमें टवीट के माध्यम से अमित शाह ने उन्हें याद दिलाया है कि जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का एलान हुआ था उस समय राजीव गांधी यानी राहुल गांधी के पिता ने उसका विरोध किया था। लेकिन सवाल यह है कि स्वयं अमित शाह तो उस समय कुछ थे नही तो क्या उस समय उनकी पार्टी के तत्कालीन आका मंडल आयोग की रिपोर्ट का समर्थन कर रहे थे। जनाब भाजपा भी तो मंडल रिपोर्ट के विरोध मेें खड़ी थी और लगभग सारे राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि मंडल की काट के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा निकालकर भाजपा द्वारा कमंडल लाया गया था। जिसके हीरो थे लालकृष्ण आडवाणी तो उनके रथ के सारथी थे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
भाजपा नेताओं में मारीच का कुछ अंश नजर आता है इसलिए कपटाचार में उनका कोई सानी नही है। कल उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट के विरोध को भुनाया था और आज उनकी आंखे मंडल प्रेम में बह रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे राष्ट्रवादी ज्वार के कारण इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई सिख विरोधी हिंसा को खालिस्तान का दमन मानकर प्रकारांतर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपना समर्थन प्रदान किया था जिसकी वजह से संघ ने 1984 के चुनाव में भाजपा से विमुख होकर कांग्रेस को इस कदर बल प्रदान किया कि अटल बिहारी बाजपेयी तक को हार कर नीचा देखना पड़ा था। भाजपा संघ का समर्थन न मिलने की वजह से ही केवल दो सीटों पर सिमट कर रह गई थी। अब यह अवसरवाद की पराकाष्ठा लगती है कि भाजपा सिखों के कत्लेआम के लिए खुद को दूध से धुला दिखाती हुई अकेली कांग्रेस के सिर पर इसका ठीकरा फोड़े। सही बात यह है कि भाजपा को खुद भी संघ की उस समय की भूमिका के लिए अफसोस होना चाहिए।
प्रतिबद्धता की राजनीति का इस देश में घोर अकाल है। जिससे यहां का समाज हमेशा भ्रमित बना रहता है। प्रगति की ओर उसकी अग्रसरता मेें यह एक बड़ी रुकावट है। मोदी सरकार के चार वर्षों में दलितों के साथ जो घटा वह किसी से छुपा नही है। यहां तक कि पिछड़े भी हाशिए पर रहे। मोदी का स्वयं को पिछड़े वर्ग से बताना और बाबा साहब के प्रति आराध्य जैसी श्रद्धा दिखाने का प्रलाप बिगड़ती स्थितियों को सुधारने में कोई योगदान नही कर सका। लेकिन अब जबकि चुनाव की परीक्षा नजदीक है, भाजपा को एग्जामिनरों यानी बहुजन मतदाताओं से डर लग रहा है। इसलिए उनकी तुष्टीकरण के खातिर उसने यकायक कई ताबड़तोड़ कदम उठाए हैं बिना सवर्णों की परवाह किये। फिर भी उसे यह प्रयास कैश होते नही दिख रहे। एक ओर राज्यसभा में एससी, एसटी संशोधन विधेयक सर्व सम्मति से पारित हो रहा था दूसरी ओर नई दिल्ली में ही जंतर-मंतर पर दलित संगठन सरकार के खिलाफ दहाड़ रहे थे। जिसमें राहुल गांधी ने पहुंचकर आग में घी डालने में कोई कसर नही छोड़ी। इसलिए अमित शाह ने तड़पकर राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ टवीट की बौछार कर डाली। उन्होंने कांग्रेस को उसके दलितों और पिछड़ों के प्रति सगेपन को बेनकाब करने की भरपूर कोशिश की।
यह बात सही है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों का वर्ग चरित्र एक जैसा है। लेकिन कांग्रेस में थोड़ा लचीलपन है और वह सुधारवादी भी है। जबकि भाजपा उदारता का ढोंग तो कर सकती है लेकिन कटटर और दकियानूसी सोच का दामन नही छोड़ सकती। यह देश का दुर्भाग्य है कि लोकतंत्र के इतने दशक गुजारने के बाद भी यहां वृहत्तर नागरिक चेतना अतीत के सामाजिक बिखरावों को अपने आगोश में समेट कर खत्म नही कर पाई। इसकी वजह आजादी के बाद जातिगत अस्मिताएं और प्रबल होती चली गईं। भाजपा युग में वर्ण संघर्ष को और बढ़ावा मिला क्योंकि संस्कृति के नाम पर जिन तौर-तरीकों और विचारों का पोषण उसका मकसद है उनके चलते ऊंच-नीच और विलगाव की ग्रंथि को समाज में नये सिरे से बढ़ावा मिला है।
अवसरवादिता से समाज में कोई सुधार संभव नही है। इसके लिए वैचारिक ईमानदारी का परिचय देना होगा। स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की विचारधारा के इस युग में वर्ण व्यवस्था का वापस लौटना संभव नही है। फिर भी वर्ण व्यवस्था की बहाली का भ्रम पैदा करने से देश की ऊर्जा और समय की बर्बादी होगी, जो हो रही है। भारतीय संस्कृति के कई आयाम है लेकिन इसमें उन पहलुओं का मोह छोड़ना ही होगा जो श्रेष्ठता के दंभ को कुछ वर्गों में उकसाने का कारक बनकर जातिगत पृथक्करण को बनाये रखने के उपक्रम सिद्ध हो रहे हैं। अगर वैचारिक ईमानदारी होती तो सामाजिक जागरूकता के प्रयास छदम आस्थाओं को तिलांजलि देकर सामने लाये जाते और ऐसी स्थिति में सरकार के सुधारवादी कदमों से जाति विग्रह का अखाड़ा सजने की बजाय पूरे समाज में इनकी सकारात्मक स्वीकार्यता का सुहावना दृश्य नजर आता।






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