उरई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की लंबी बीमारी के बाद देहावसान के साथ ही भारतीय राजनीत के एक युग का अंत हो गया। अटल बिहारी बाजपेयी के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि छात्र जीवन में साम्यवादी दल की छात्र शाखा से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरूआत की थी। जिसमें वे आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के उम्मीदवार के रूप में ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज से छात्र संघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। श्री बाजपेयी बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर प्रचारक बन गये। संसद का पहला चुनाव उन्होंने 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से जीता। उन्होंने संसद में अपने पहले भाषण में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को अपना मुरीद बना लिया था। जवाहर लाल नेहरू ने उसी समय भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन बाजपेयी खुद इस देश के प्रधानमंत्री बनेगें और यह भविष्यवाणी चरितार्थ साबित हुई।
अटल बिहारी बाजपेयी को ग्वालियर से काफी लगाव था। लेकिन 1984 में माधवराव सिंधिया के आगे ग्वालियर में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा था। उन्होंने अपने बचपन के कुछ दिन भिंड में भी बिताये। भिंड की मदन मोहन गली में जिस मकान में वे रहते थे इन पंक्तियों का लेखक भी बाद में उसी मकान में रहा। न केवल इतना बल्कि अटल जी का जो स्टडी रूम उस समय था वही स्टडी रूम इन पंक्तियों के लेखक का रहा। जिसकी गवाही उक्त मकान के वर्तमान स्वामी अनुराग मिश्रा से ली जा सकती है। उरई से भी अटल जी का विशेष लगाव था। स्व. बाबूराम एमकाम के लिए जब वे एक जनसभा को संबोधित करने के लिए उरई आये थे तो उन्होंने अपने संबोधन में स्वयं कहा था कि उन्हें उरई के रसगुल्ले बहुत पंसद हैं। जब भी वे ट्रेन से यहां से होकर गुजरे उन्होंने उरई के रसगुल्लों की फरमाइश अपने लोगों से की। अटल जी को चुनाव न जीत पाने के बावजूद ग्वालियर, भिंड और उरई के लोगों से बहुत प्यार था और यहां के लोग भी अटल जी से अपने जुड़ाव पर नाज महसूस करते हैं। इसीलिए अटल जी के निधन की खबर से इन जिलों में हर वर्ग के लोग गमगीन देखे जा रहे हैं।

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