जालौन-उरई। रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरियों का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं ने तालाब में भुजरियां सिराकर नाचगान भी किया।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी भुजरियों के विसर्जन का भारी उत्साह देखा गया। महिलाओं और बच्चों ने अपने घर में हुई भुजरियों को देवी मंदिरों से होते हुए तालाब में सिराया। महिलाओं ने जहां नृत्य करते हुए लोकगीत गाये वहीं पुरुषों ने एक-दूसरे को भुजरियां देकर गले मिलते हुए पुराने गिले-शिकवे दूर किये।
बुंदेलखंड में भुजरियों का विसर्जन रक्षाबंधन के अगले दिन करने की परंपरा के पीछे आल्ह खंड की कहानी जुड़ी हुई है जिसके अनुसार जब पृथ्वीराज चैहान ने महोबा को घेर लिया और उस पर चढ़ाई करने का विचार किया तब रानी मल्हना ने अपने कुलदेवता मनिया देव का आवाहन किया। मनिया देव ने इस पर बाहर रह रहे ऊदल को स्वप्न दिया कि महोबा पर भारी संकट आया है तुम जाकर उसे बचा लो। तब ऊदल ने मलखान, सैय्यद आदि के साथ साधु के भेष में महोबा पहुंचकर पृथ्वीराज से युद्ध किया और उसे वापस दिल्ली भगा दिया। यह लड़ाई रक्षाबंधन के दिन खत्म हुई। इसके बाद ऊदल की बहन चंद्रावल ने भुजरियों को रक्षाबंधन के दूसरे दिन विसर्जित किया।
भुजरियां मेलें के दौरान भारी गहमा-गहमी के मददेनजर पुलिस प्रशासन द्वारा व्यवस्था को दुरुस्त रखा गया। जिससे कोई अप्रिय घटना न हो सके।






Leave a comment