* नहीं चला उत्तराधिकार का पांसा, निवर्तमान दिवंगत प्रधान का बेटा चुनाव हारा

कोंच-उरई । सिमिरिया प्रधानी उपचुनाव में स्थापित रानैतिक समीकरण पूरी तरह से गड़बड़ाये दिखे। अमूमन जितना छोटा चुनाव होता है उतना ही जातिवाद का बिष उसमें घुला रहता है, लेकिन सिमिरिया उपचुनाव ने उन राजनीतिबाजों जो जातिवाद को आधार बना कर चुनाव जीतने का खेल खेलते हैं, को बता दिया है कि अब ये कार्ड नहीं चलेगा बल्कि जनता अब विकास चाहती है। सिमिरिया की प्रधानी जीतने बाले हरिश्चंद्र की याज्ञिक (नाई) विरादरी के उस गांव में केवल पांच घर हैं और मात्र तीस वोट की पूंजी है लेकिन उसे सभी वर्गों का जब समर्थन मिला तो उसने 489 वोट पाए और चुनाव जीत लिया। ग्रामीणों की अगर मानें तो हरिश्चंद्र ने प्रधान नहीं रहते हुये भी हमेशा ग्रामीणों की मदद की और उनके काम आता रहा जिसका सिला गांव बालों ने उसे चुनाव जिता कर दिया। यहां खास बात यह भी है कि चुनाव मैदान में याज्ञिक विरादरी का एक और भी प्रत्याशी वीरबल मैदान में था जिसे 43 वोट मिले थे। गौरतलब यह भी है कि इस चुनाव में उत्तराधिकार की प्रथा का भी मिथक टूटा है। निवर्तमान दिवंगत प्रधान का बेटा संजय पटेल भी चुनाव में उम्मीदवार था लेकिन ग्रामीणों ने उसे नकार दिया।

 

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