0 दुष्यन्त जयंती पर एक शाम कमल हातवी के नाम
0 पहचान संस्था का कवि सम्मेलन/मुशायरा ऐतिहासिक रहा…..
उरई। शनिवार को सिटी सेंटर उत्सव गृह में पहचान संस्था द्वारा कवि/शायर दुष्यन्त कुमार की जयंती पर आयोजित एक शाम कमल हातवी के नाम कवि सम्मेलन/मुशायरा ऐतिहासिक रहा। वरिष्ठ कवि पं. यज्ञदत्त त्रिपाठी की अध्यक्ष एवं मुख्य विकास अधिकारी अवधेश बहादुर सिंह, अपर जिला मजिस्ट्रेट प्रमिल कुमार सिंह, अपर पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र नाथ तिवारी, पत्रकार/स्तम्भकार केपी सिंह व वीरपाल दादी के विशिष्ट आतिथ्य तथा परगनाधिकारी उरई विकास कश्यप, कोतवाल उरई रुद्र कुमार सिंह की प्रमुख उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन पहले संस्था के संस्थापक गिरधर खरे एवं बाद में झांसी से पधारे कवि अर्जुन सिंह चांद ने किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में आये हुए अतिथियों का पहचान संस्था के पदाधिकारियों युसुफ अंसारी, संजय दुबे, बच्चू महाराज, चंद्रप्रकाश दुबे, पवन गुप्ता लालू, डा. उमाशंकर सोनी, डा. अनिल गुप्ता आदि ने बैच लगाकर व माल्यार्पण कर स्वागत किया।
कवियित्री प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’ द्वारा की गई सरस्वती वंदना एवं शायर सरवर कमाल झांसी तथा कमल हातवी द्वारा पेश किये गये नात-ए-पाक के अशआर से शुरू यह गंगा जमुनी महफिल देर रात तक घोर साहित्यिक परिधान और अदबी पैरहन में सैंकड़ों श्रोताओं को नसीहतों का साया बनी रही। कीर्तिशेष कवि/शायर दुष्यंत कुमार की ‘‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’’ को सार्थक करती इस महफिल के सिरमौर शायर कमल हातवी ही रहे। ‘‘सितारे क्या हैं, माहताब है क्या, रूखे नवी के मुकाबिल किसी की ताव है क्या’’ के साथ जब कमल हातवी ने फरमाया कि ‘‘गरीबों के ये घर अल्लाह के बंदे चलाते हैं, खुदा ही जानता है कैसे हमल रिश्ते चलाते हैं। सवारी हर घड़ी खतरे के साये में ही रहती है, सियासत ऐसी गाड़ी है, जिसे अंधे चलाते हैं’’- तो तालियों की जो गड़गड़ाहट पेश हुई, वह लगभग घण्टे भर तब तक जारी रही, जब तक वह तमाम कतात और गजलें पेश करते रहे। इन कतता और गजलों ने एक शाम कमल हातवी के नाम को सार्थक किया।
प्रारम्भ में शायर/कवि महेंद्र मिहौनवी ने अपनी शायरी और कविताओं का जादू श्रोताओं पर चलाया और कपड़े डुबो के इत्र में पहने तो क्या हुआ, बदबू भरी है आपके दिलों दिमाग में तथा यारों बड़ी अजीब सियासत का दौर है, उल्लू के सिर पर ताज है बिजली विभाग में, कहकर तमाम तालियां बटोरी। शायर सरवर कमाल झांसी ने नात-ए-पाक में – सारा जग हुआ रौहान मुस्तफा के आने से पढ़कर जो छाप छोड़ी, उसे उन्होंने अनेक कतात, गजलें और गीत में बरकरार रखा और एक-एक शेर पर तालियां बटोरीं। उनकी गजल- कहा था तुम से कि मत आ किसी के कहने में, कि अब चलेगा पता हमसे दूर रहने में-मकबूल रही। शायर शरीफ शहबाज ने इस बार भी अपने कलाम से उरई के अवाम को सम्मोहित किया। उन्होंने जब कहा कि हो जाओ एक राम के और रब के नाम पर, कब तक लहू बहाओगे मजहब के नाम पर, तो सारी महफिल वाह-वाह कर उठी।
इस तमाम अदबी महफिल में बाराबंकी से पधारे कवि विकास बौखल का हास्य और व्यंग्य का अपना किरदार निराला रहा। करीब आधा घंटे के काव्यपाठ में तालियों व ठहाकों का सिलसिला थमा ही नहीं। अपने महबूब से इस दर्जा लगन होती है, वो किसी और को देखे तो जलन होती है- महफिल को इस रंग की अनेक गजलें और कतात चरखारी से पधारी शायर शबाना सबा ने दी और अपना एक खास मुकाम बनाया। कवियित्री गीता चतुर्वेदी औरैया ने कई मुक्तक और गीतों की प्रस्तुति दी। उनका मुक्तक- सुखों की चाहतों का न कहीं और कोई अन्त होता है, कि सत्ता चाहने को फिर बड़ा षड़यंत्र होता है- काफी सराहा गया।
अखिल भारतीय कवि रविंद्र शर्मा, कवियित्री नीलम कश्यप, शायर नासिर अली नदीम ने भी प्रमुखता से प्रस्तुतियां दीं। पहचान संस्था के अध्यक्ष शफीकुर्रहमान कश्फी व अन्य पदाधिकारी गिरधर खरे, विनोद गौतम, असरार अहमद मुकरी, कृपाराम कृपालु, डा. अनुज भदौरिया आदि के प्रतीकात्मक काव्यपाठ किया, जिसे काफी सराहा गया।
अपने कुशल संचालन से आयोजन को ऐतिहासिक बनाने वाले कवि अर्जुन सिंह चांद ने अनेक छन्द, गीत, गजल और मुक्तक देकर अपनी श्रेष्ठता की पूरी-पूरी छाप छोड़ी। चांद का बरगद शीर्षक से पढ़ा नया-नया गीत- सूख गयी आंगन की तुलसी, नागफनी बौराई है, ने क्षरित होती भारतीय संस्कृति पर तमाम सवाल खड़े हुए।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में पं. यज्ञदत्त त्रिपाठी ने पहचान संस्था के कार्यक्रमों को साहित्य और अदब का इतिहास सरचने वाला बताया। उन्होंने कहा कि एक ओर जहां कवि सम्मेलनों में फूहड़ता और चुटकुलों ने साहित्य को भारी क्षति पहुंचाई है वहीं स्तरीय रचनाओं को नाकाफी साबित कर समाज को गंदगी से भरने का भी काम आगे बढ़ा रखा है, किंतु पहचान के इस आयोजन ने बताया कि असल साहित्य तब सिर चढ़के बोलता है, अब मंच सये चुटकुलेबाजों का सफाया कर दिया जाये। उन्होंने प्रतीकात्मक काव्यपाठ किया। विशिष्ट अतिथि पत्रकार/स्तम्भकार केपी सिंह ने अपने संक्षिप्त उदबोधन में कवि/शायर दुष्यन्त कुमार जिन्दगी की अनछुये पहलुओं को उजागर किया और उनकी काव्य की सराहना करते हुए पहचान संस्था द्वारा आयोजित उक्त कार्यक्रम को ऐतिहासिक रूप से सफल बताया।
इस ऐतिहासिक महफिल को सजाने में पहचान संस्था के पदाधिकारियों की परिपक्व सूझ व समझ का भारी योगदान रहा।






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