• सन् 1913 में शुरू हुई थी हुल्का मैया की विदाई की परंपरा

  • इस बर्ष 22 सितंबर को होगा ‘बड़ी पूजा  का आयोजन

उरई । यह बर्ष कोंच में ‘बड़ी पूजा का है, यानी रोमांच और विस्मय से भरा एक आयोजन जो हर तीन साल में कोंच में मनाया जाता है। इबकी दफा यह 22 सितंबर को पड़ रही है। कोंच की यह ऐसी लोक परंपरा है जो अब धार्मिक आस्था की पराकाष्ठा पार कर चुकी है। मान्यता है कि यह पूजा नगर व क्षेत्र को महामारी, अकाल और दुर्भिक्ष जैसी आपदाओं से अभय प्रदान करने बाली है। इस पूजा के आयोजन को एक शताब्दी से भी ज्यादा समय हो गया है और आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ ‘और भीÓ बड़े रूप में जारी है।

बुंदेलखंड का लोक जीवन भी बड़ा ही विचित्र है, ऐसी ही लोक रीतियों और धार्मिक मान्यताओं के समन्वय से उपजी आस्था का ऐसा रूप है हुल्का देवी की विदाई यानी ‘बड़ी पूजाÓ जिसे समूचा नगर बिना किसी जाति भेद या पूजा पद्घति के मनाने के लिये सन्नद्घ रहता है। प्रत्येक तीन बर्ष में आयोजित होने बाले इस धार्मिक अनुष्ठान को लेकर यहां मान्यता है कि मैया क्षेत्र को महामारी, अकाल, दुर्भिक्ष जैसी आपदाओं से बचाती हैं। इस आयोजन के प्रादुर्भाव को लेकर यद्यपि कोई अभिलेखीय साक्ष्य और पुष्टï प्रमाण तो नहीं हैं, लेकिन जिन परिवारों की इसमें शुरुआती सहभागिता रही है उनमें एक परिवार स्थानीय मालवीय नगर बजरिया के स्वर्गीय मुनू रजक का है। उनके पुत्र हरगोविंद के अनुसार सन् 1913 में यहां भयंकर महामारी फैली थी, हालात यह थे कि श्मशान में दो शवों का अंतिम संस्कार संपन्न नहीं हो पाता था तब तक चार शव और वहां पहुंच जाते थे। कस्बे के नागरिक इस महामारी से इतना भयभीत हो गये कि अधिकांश घर खाली हो गये, कुछ ने अपने नाते रिश्तेदारों के यहां शरण ली तो तमाम लोग बाहरी इलाकों में अवस्थित बाग बगीचों में शरण लेने को मजबूर हो गये। इसी बीच बताते हैं कि डाढी नाका स्थित महंतजी के नये बगीचे में नीबू के पेड़ के पास हुल्का देवी ने एक कन्या का रूप धारण कर दर्शन दिये और कहा कि महामारी के डर से कोई भागे नहीं बल्कि उनकी विदाई करे। उसके बाद शिवरानी रायकवार, गंभीरा एवं गेंदारानी पर मैया की पहली सवारी आई और इस तरह ‘बड़ी पूजाÓ का आयोजन प्रारंभ हुआ। तीन साल में इस पूजा के आयोजन के पीछे तर्क बताया गया कि उस वक्त लोगों की माली हालत ठीक नहीं थी और हर साल इसका आयोजन कर पाना संभव नहीं हो पा रहा था, सो हर तीन साल में इसके आयोजन की परंपरा बन गई। कालांतर में मैया की सवारी नईबस्ती में रहने बाली रामरती कुठौंदा बाली एवं धोबिन बऊ के ऊपर भी होने लगी। रामरती के निधन के बाद सवारी उनके दामाद गंगाराम पटेल के ऊपर होने लगी।

यह पूजा विचित्र भी है, इसके तीन आयाम हैं जो सभी पूरे करने होते हैं। चूंकि मैया की विदाई का यह आयोजन है सो इसमें विदाई की सभी रस्में निभाईं जाती हैं। धोबिन बऊ के यहां से सुहाग आता है और गंगाराम पटेल के यहां से डोला, जबकि टिपरिया महंत ब्रजभूषण दास के यहां से लाये जाने की परंपरा है। परंपरा यह भी है कि मैया के डोले को पहला कंधा महंतजी के परिवार का ही कोई सदस्य लगाता है तभी मैया की विदा यात्रा प्रारंभ होती है। एक पुरानी किंवदंती यह भी है कि श्रावण मास में बहिनों को घर बुलाने का रिवाज है ऐसे में मैया की विदाई आषाढ मास में उचित नहीं मान कर भादों माह के शुक्ल पक्ष के किसी भी शनिवार में इस पूजा का आयोजन किया जाता है, यह परंपरा आज भी लागू है। इस ‘बड़ी पूजाÓ का कितना महत्व है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दिन लोग अपने सभी जरूरी कामों को बंद कर इस पूजा में सम्मिलित होते हैं। पूजा के दौरान घरों में आई बेटियों को मैया की विदाई के बाद ही विदा किया जाता है।

‘बड़ी पूजाÓ में महिलाओं के लिये कुछ वर्जनायें भी निर्धारित हैं जिनका पालन बड़े ही अनुशासित ढंग से करना होता है। महिलाओं को मैया की विदाई यात्रा में शामिल होने की मनाही नहीं है, लेकिन इस दौरान वे श्रृंगार नहीं कर सकती हैं, उन्हें अपने केश खुले रखने होते हैं। प्रावधान यह भी है कि गांव के गेंवड़े यानी सीमा जो पूजा के प्रादुर्भाव काल में रेलवे क्रॉसिंग माना जाता था, से जब मैया का डोला आगे बढता है तो महिलाओं को इससे आगे जाने की सख्त मनाही है और वहां से वे अपने घरों को लौट जाती हैं। ‘बड़ी पूजाÓ का प्रारंभ नगर के दक्षिण पश्चिम छोर पर स्थित लाला हरदौल के मंदिर से सुबह होता है और दिन भर यह यात्रा राजमार्ग पर चल कर देर शाम पडऱी नाका स्थित हुल्का मैया के मंदिर पर समाप्त होती है। तकरीबन चार किमी की इस यात्रा में शरबत, दूध और मदिरा की तीन धारायें अनवरत चलती हैं। इन धाराओं के पीछे मान्यता है कि रास्ते में जो अदृश्य शक्तियां मिलती हैं वे अपने अपने भोज्य के अनुसार इन्हें ग्रहण करती हैं। शोभायात्रा जब सागर चौकी तिराहे पर पहुंचती है तो वहां लाला हरदौल का एक और स्थान मिलता है जहां हुल्का मैया का विश्राम होता है और वहां वीर बुंदेला लाला हरदौल देवस्थान समिति द्वारा आवश्यक अनुष्ठानिक औपचारिकताओं के बाद मैया का डोला पुन: यात्रा पर आगे बढता है। इस लंबी और दिन भर चलने बाली यात्रा का समापन पडऱी नाका स्थित मां हुल्का देवी मंदिर पर होता है जहां मैया के रथ में जुते बकरों को खेतों में छोड़ दिया जाता है और वहां पर वाराहों की बलि दी जाती है। नौ देवियों के नौ खप्पर फूल, गंगाजल, रक्त, नीबू, दूध, मदिरा, दही, शरबत एवं अंडों के भर कर मंदिर के पिछवाड़े खेतों में रखे जाते हैं।

 

तीन सेर वेसन से बनाई जाती है हुल्कादेवी की प्रतिमा

प्रत्येक तीन बर्ष में आयोजित होने बाली बड़ी पूजा में हुल्का मैया की प्रतिमा का निर्माण तीन सेर वेसन से किया जाता है। इसके अलावा हर पूजा में नये वस्त्रों और आभूषणों से उन्हें अलंकृत किया जाता है। लाला हरदौल मंदिर बजरिया में बड़ी पूजा के दिन पहला हौम देकर यात्रा का श्रीगणेश करने बाले जवाहर वर्मा बताते हैं कि मैया के रथ में जो दो बकरे जोते जाते हैं उनका रंग सुर्ख काला होना अनिवार्य है। ऐसे बकरे तलाशने में यद्यपि काफी कठिनाई होती है लेकिन परंपरा के मुताबिक व्यवस्था कर ली जाती है। वे बताते हैं कि इस अभूतपूर्व आयोजन के लिये धन जुटाने के लिये किसी से भी सहयोग नहीं मांगा जाता है बल्कि पूजा के एक सप्ताह पूर्व से लाला हरदौल मंदिर पर चढावा और मैया की गांठ बंधाई में इतना धन एकत्रित हो जाता है कि आयोजन बखूबी निपट जाता है। लाला हरदौल के स्थान से शुरू होकर हुल्का देवी मंदिर तक जाने बाली बड़ी पूजा को लेकर लोगों के मन में हरदौल और हुल्का के बीच संबंधों की उत्सुकता को शांत करते हुये आयोजन कमेटी से जुड़े लोग श्यामदास याज्ञिक, नरेश वर्मा आदि बताते हैं कि हुल्का मैया को लाला हरदौल की भाभी के रूप में मान्यता प्राप्त है और हर तीसरे बर्ष वे अपना स्थान छोड़कर लाला हरदौल के स्थान पर आ जाती हैं, इसलिये हर तीसरी साल इस बड़ी पूजा यानी हुल्का मैया की विदाई का आयोजन किया जाता है। उनका मानना है कि हुल्का मैया की विदाई नहीं करने पर अनिष्टï की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि हरदौल मंदिर से घुल्लों पर जो सवारी चलती है वह सिर्फ गांव के गेंवड़े यानी रेलवे क्रॉसिंग तक ही होती है, क्रॉसिंग पार करते ही घुल्ले शांत हो जाते हैं।

 

तांत्रिक पूजा है हुल्का मैया की विदाई

हुल्का मैया की तिसाला बड़ी पूजा अर्थात् मैया की विदाई पूरी तरह से तांत्रिक अनुष्ठान है, इसमें वैदिक रीति नीति का कहीं भी प्रयोग नहीं है। नगर के विद्वान ब्राह्मïण पं. लल्लूराम मिश्रा व पं. विनोदकुमार द्विवेदी दरोगाजी बताते हैं यद्यपि यह तांत्रिक अनुष्ठान है और इसके क्रियाकलापों में विप्र समाज या वैदिक रीतियों की कोई भूमिका नहीं है लेकिन हुल्का मैया या लाला हरदौल के प्रति उनकी या विप्र समुदाय की आस्था कम नहीं हो जाती है। इस बड़ी पूजा के प्रति पूरा नगर आस्थावान है और मैया की असीम कृपा का सदैव आकांक्षी रहता है। बताना समीचीन होगा कि बड़ी पूजा में कोई ऐसा आयाम नहीं है जहां वैदिक परंपरा की उपयोगिता हो, इसके इतर इस पूजा में आद्यंत अनुष्ठानों और परंपराओं में गुनियाओं, ओझाओं, घुल्लों या तांत्रिक क्रियाकलापों के जानकारों की ही भूमिका केन्द्र में होती है।

 

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