यादव बाहुल्य आजमगढ़ संसदीय सीट पर दलित प्रत्याशी को उतारने का प्रयोग अपनी पार्टी की जहनियत के कारण आत्मघाती हो सकता है यह बात सपा के मुखिया अखिलेश यादव को नामांकन के पहले ही सामने आयी प्रतिक्रियाओं से समझ में आ गया। लोहियावाद की बिडम्बनायें बहुत उजागर हैं। उनके नाम का मंत्र जाप करके सत्ता में पहुंचे नेता अपनी करनी से यह साबित करते रहे कि अपने मानस पिता के विचारों को जमीन पर उतारने के मामले में वे कितने प्रेक्टिकल हैं जो जानते हैं कि लोहियावाद के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता कलयुग केवल नाम अधारा तक ही देखी जानी चाहिए। इससे आगे बढ़ने का अर्थ अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा जोखिम भरा हो सकता है।
डा0 राम मनोहर लोहिया भी बाबा साहब अम्बेडकर की तरह मानते थे कि लोकतंत्र को इस देश में सिद्धांत से व्यवहार में उतारने के लिए बहुत जरूरी है कि पहले सामाजिक लोकतंत्र लाने के लिए पूरा होमवर्क किया जाये। सामाजिक परिवर्तन के बाद ही राजनीतिक परिवर्तन मुमकिन हो पायेगा। इसलिए वे कहते थे कि वर्ण व्यवस्था के कारण हमेशा वर्चस्व में रहे सवर्णों को अब 50 साल तक पीछे रहकर काम करने की आदत डालनी होगी और उन्हें सबसे आगे लाना होगा जो वर्ण व्यवस्था में सबसे पीछे रखे गये हैं। इसकी व्याख्या के लिए बड़ी माथा पच्ची की जरूरत नहीं है। इसका संदेश साफ है कि दलित जिन्होंने वर्ण व्यवस्था के कारण सर्वाधिक वंचना और अन्याय को भोगा है उनकी इच्छा थी कि इसके कारण दलित समुदाय को सबसे आगे रखकर उनके नेतृत्व में आगे बढ़ने का संकल्प सभी को साधना होगा। नेतृत्व में पिछड़ों को उनके बाद अवसर होना चाहिए। पर क्या वे ऐसा कर पाये।


डा0 लोहिया ने देश के दूसरे आम चुनाव के पहले कोशिश की थी कि उनकी पार्टी का गठबंधन डा0 अम्बेडकर के साथ हो जाये और अनुमान लगाया जाता है कि डा0 अम्बेडकर उनके प्रस्ताव से सहमत भी हो गये थे लेकिन यह फलित होता इसके पहले ही बाबा साहब अम्बेडकर चल बसे। लेकिन अगर बाबा साहब का असामायिक निधन न हुआ होता तो क्या यह संभव था कि डा0 लोहिया के अनुयायी अपने नेता की इच्छा का सम्मान करते हुए गठबंधन के सफल होने पर सत्ता में बाबा साहब की छ़त्र छाया में काम करना स्वीकार कर पाते। निश्चित रूप से इसमें पर्याप्त संदेह है।

डा0 लोहिया रणनीतिक तौर पर कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने में सफल हुए जिसे वे लोकतंत्र की मशीन को गतिशील करने की पहली शर्त मानते थे। लेकिन उन्होंने इसके लिए बीज बोने में जो मेहनत की थी उसकी फसल जब तक सामने आयी तब तक डा0 लोहिया भी आंखे मूंद चुके थे। इमरजेंसी के बाद 1977 में पहली बार केन्द्र में कांग्रेस को पराजय का दंश झेलना पड़ा था जिसमें गौर करने लायक तथ्य यह है कि दक्षिण में तो इमरजेंसी की ज्यादतियों की तमाम दंड कथाओं के बावजूद कांग्रेस ही आगे रही थी पर उत्तर में जहां लोहियावाद का राजनीतिक प्रकोप एक दशक पहले से असर दिखाने पर पहुंच गया था वहां प्रतिपक्ष की इसी जमीन के कारण कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद लोहियावाद की पहली अग्नि परीक्षा सामने आयी। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे कांगे्रस से इमरजेंसी खत्म होने की घोषणा के बाद पाला बदलकर आये जगजीवन राम का नाम उनके प्रशासनिक तजुर्बे की वजह से सबसे ऊपर होना चाहिए था पर लोकदल उनके विरोध में अड़ गया। यहां तक कि लोकदल के नेता चैधरी चरण सिंह अपना नम्बर न देख मोरारजी देसाई जैसे रूखे आदमी के लिए सहमत हो गये पर जगजीवन राम को सिर पर बैठाना उन्हें गंबारा नहीं हुआ। दलित के नेतृत्व के संबंध में लोकदल यानी लोहियावादियों ने ही सर्वाधिक एलर्जी दिखाई जबकि जनसंघ घटक उनकी तुलना में उदार रहा। हालांकि इस घटक के नेता वर्ण व्यवस्था के पुनरूत्थान के समर्थक के रूप में पहचाने जाते थे। बाद में जब जनता पार्टी टूट गई और सोशलिस्ट अलग हो गये तो जनसंघ घटक के नेताओं के हस्तक्षेप से 1980 का लोकसभा चुनाव जनता पार्टी ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट करते हुए लड़ा जो सुबूत है कि सामाजिक मामले में जनसंघी उतने कट्टर साबित नहीं हुए जितने लोकदली।
गौर करने लायक यह भी है कि पिछड़े नेतृत्व को आगे बढ़ाने की वजह से ही दलित लोकदल परिवार यानी सोशलिस्टों से सशंकित रहते थे इसीलिए वे कांगे्रस के साथ बने रहे और जब तक यह साथ रहा लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद को फलित करने के लिए जितने भी ब्रह्मास्त्र चलाये सभी नाकाम हो गये। जनता पार्टी में जगजीवन राम के आने से पहली बार सारे उत्तर भारत में दलितों ने अपनी इस राजनीतिक आस्था को बदला और नतीजतन सत्ता की बिसात पर कांग्रेस चित हो गई। जगजीवन राम के तिरस्कार के कारण ही प्रतिपक्ष दलितों को विश्वास बहुत दिनों तक संजोकर नहीं रख सका और मात्र ढाई वर्ष बाद 1980 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में दलित फिर कांग्रेस में लौट गये।


1989 भारतीय राजनीति का एक और टर्निंग प्वाइंट बना जब वीपी सिंह के तुफान ने न भूतो न भविष्यतो वाले बहुमत से पदारूढ़ हुई राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से खदेड़ डाला लेकिन वीपी सिंह के जनता दल में जो वर्ग शक्तिया हावी थी वे लोकदल परिवार यानी सोशलिस्ट अतीत वाली वर्ग शक्तियां थी। डा0 लोहिया की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वे इन वर्ग शक्तियों को अपनी सामाजिक व्याख्या में दीक्षित नहीं कर पाये। चैधरी चरण सिंह के देश के सबसे बड़े सूबे से लेकर राष्ट्रीय स्तर के बेहद कद्दावर नेता बनने तक डा0 लोहिया की वैचारिक ऊर्जा का बड़ा योगदान था लेकिन दलितों संबंधी पूर्वाग्रह हावी रहने के लिए उनका राजनीतिक व्यक्तित्व अभिशप्त रहा। इसीलिए उन्होंने जब स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का मौका पाया तो दलितों को साथ लेकर चलने की बजाय अजगर का नारा लगाया। अजगर यानी अहीर, जाट, गूर्जर और राजपूत आखिर इसकी सामाजिक लोकतंत्र की किस दिशा के बतौर किस तरह शिनाख्त की जानी चाहिए राजनीति के सयानों को यह बताने की जरूरत नहीं है। यह संयोग नहीं है कि चैधरी चरण सिंह के समय उनके निर्वाचन क्षेत्र बागपत में दलितों को मतदान न करने देने की आम शिकायत रही और इसीलिए जब राजनारायण ने चैधरी चरण सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा तो बागपत में इन्दिरा गांधी ने दलितों के लिए सचल मतदान केन्द्र की व्यवस्था कराई।


राजनारायण लोहिया जी के दुलारे शिष्यों में से थे। पर उनके कारनामे भी ख्याल रखे जाने चाहिए। जब जनता पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की आवाज बुलंद होने लगी तो एक बार फिर प्रधानमंत्री पद के लिए जगजीवन राम का नाम उछला और उस समय राजनारायण ही थे जो उनके चरित्र हनन के लिए सुरेश राम की नग्न तस्वीरें बांटने में आगे आये थे। क्या ऐसे मौके पर राजनारायण को सामाजिक परिवर्तन के लिए दलितों को सबसे आगे करने की लोहिया जी की नसीहत का स्मरण करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी।
लोहिया जी के स्वयंभू पेटेंट धारक मुलायम सिंह की तासीर भी गौर करने लायक है। अगर लोकदल परिवार और परंपरा सोशलिस्ट परंपरा से अलग है तो पारिस्थितिक साक्ष्यों के आधार पर मानना पड़ेगा कि मुलायम सिंह मूल सोशलिस्ट परिवार का नहीं, लोकदल परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो डा0 लोहिया की बजाय चैधरी चरण सिंह से अनुप्रेरित होता है। मुलायम सिंह ने एक समय कांशीराम से गठबंधन जरूर किया था लेकिन विचारधारा और सैद्धांतिक लक्ष्य से अलग इसके पीछे सीमित रणनीतिक तकाजे थे। इसीलिए सपा-बसपा गठबंधन स्थायी भाव की बजाय संचारी भाव की परिणति में जल्द ही गर्क हो गया और इसके बाद मुलायम सिंह ने बाबा साहब अम्बेडकर के लिए जो अपमानजनक भाषण दिये उससे उनका दलित विरोधी माइंडसेट उजागर होकर सामने आ गया। इसीलिए मुलायम सिंह के अनुयायियों को सवर्णों के नीचे काम करना मंजूर हो जाता है पर दलितों के नेतृत्व में नहीं। अखिलेश ने राजनीतिक परिपक्वता आने के बाद जब समझा कि वर्ण व्यवस्था विरोधी सामाजिक ताकतों को गोलबंद करके ही वे भाजपा के अपराजेय बन चुके दुर्ग को भेद पायेंगे तो उन्होंन एक बार फिर समाजवादी पार्टी को बसपा के साथ गठबंधन की पटरी पर लाने की पहल तमाम जोखिम उठाकर की लेकिन 2019 के चुनाव में यह उन्हें महंगा साबित हुआ। मैनपुरी की सभा में अपनी पत्नी डिंपल यादव से मायावती के सार्वजनिक रूप से चरण स्पर्श कराने के कारण अखिलेश से अपने ही वोटरों ने मुंह मोड़ लिया।


अपनों की दलितों को लेकर यह ग्रन्थि मिटा पाना आज अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। पर लीक से हटकर चलने में तात्कालिक तौर पर बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं लेकिन इसके बाद बड़ी सफलताओं का मार्ग भी प्रशस्त होता है जिसके गवाह खुद उनके पिता मुलायम सिंह यादव हैं। 30 नवम्बर 1990 को कारसेवकों पर गोली चलवाने के कारण उनका राजनीतिक जीवन इतने संकट में आ गया था कि लोग उनकी राजनीति के खत्म हो जाने की भविष्यवाणी करने लगे थे। 1991 के विधानसभा चुनाव में वे 30 से कम सीटों पर निपट गये थे लेकिन इसके बाद फीनिक्स पक्षी की तरह उनकी पार्टी अपनी ही राख से न केवल फिर से जन्मी बल्कि एक दौर में शिखर पर पहुंच गई। 2022 के विधानसभा चुनाव के पहले ही अखिलेश की वर्ण व्यवस्था से पीड़ित सामाजिक शक्तियों को एकजुट करने की प्रतिबद्धता झलकने लगी थी और वे इसी प्रवाह को आगे बहाने की रणनीति अख्तियार किये हुए हैं। इसके लिए उन्हें अपनों का मानस बदलने की मशक्कत करने की जरूरत है। आजमगढ़ में दलित चेहरे को सामने लाने के कदम उन्हें यह काम अभी न हो पाने की वजह से पीछे खींचने पड़े हैं पर शायद उनमें इसके बावजूद विचलन नहीं है। क्रांति की अगुवाई करने वालों ने दो कदम आगे एक कदम पीछे के सूत्र प्रतिपादित किये हैं और आजमगढ़ में सुशील आनंद की उम्मीदवारी वापस कराकर धर्मेन्द्र यादव को उम्मीदवार बनाने के उनके निर्णय के पीछे यही रणनीति देखी जानी चाहिए। अंततोगत्वा अगर वे सामाजिक लोकतंत्र की जरूरतों के अनुरूप राजनीति को आगे से, आगे बढ़ाने का साहस दिखा सकें तो शायद उनके हित में कुछ अच्छा फलित जरूर हो सकेगा।

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