जिन्दगी में प्यार से न देखा , न पूंछा –बाद मरने के मेरी कब्र पे रोने आये

पहचान के तत्वावधान में कवि गोष्ठी , मुशायरा

 

उरई | ज़िले की साहित्यिक संस्था पहचान की पावस काव्यगोष्ठी  राजेन्द्र नगर स्थित सिटी लाइफ स्कूल में   वरिष्ठ साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी की अध्यक्षता और जिला प्रोग्राम अधिकारी इफ्तखार अहमद और जिला प्रोबेशन अधिकारी डॉक्टर अमरेंद्र पोतस्यायन के मुख्य आतिथ्य में हुई  जिसका संचालन पहचान के अध्यक्ष शफीकुर्रहमान कशफी ने किया ।

कार्यक्रम का आगाज़  कवियित्री इंदु विवेक उदैनियाँ की वाणी वंदना और नईम ज़िया की नाते पाक से हुआ | इसके बाद कवियों और शायरों ने अपने गीत ग़ज़ल,मुक्तक,पढ़कर महफ़िल  को शानदार बना दिया |

 सबसे पहले मुहम्मद फ़राज़ ने पढ़ा-गुनाह माफ करा लें क़ज़ा से क़ब्ल बशर,लहद में बोझ ज़मीं का उठाओगे कैसे ,शिवम सोनी ने पढ़ा -ज़िंदा अपनी थोड़ी सी खुद्दारी रख,क्यों डरता है जंग बराबर जारी रख,फिर दिव्यांशु दिव्य ने पढ़ा- जीवन में कोई आये या जाए साथ रहे बस मौत  का साथ, अभिषेक सरल ने पढ़ा- हाथ आया और फिसल गया ,एक ख्वाब नींद को ही निगल गया| परवेज़ अख्तर ने पढ़ा- मुझको अख्तर उस इंसा से कोई मुरव्वत कैसे हो,हिन्द में रहकर दिल अपना जो रक्खे पाकिस्तान में,कवियित्री इंदु ने पढ़ा- दो बूंद चाहती हूँ अम्बर से बरस जाए,मन नेह धरातल पर थोड़ा सा रहम खाये| पुष्पेंद्र पुष्प ने पढ़ा-  मेरे दुश्मन ने फिर गर्दन झुका दी,लरजती रह गई शमशीर मेरी,फिर फरीद अली बशर ने पढ़ा- याद के बादल उठे और अश्क बरसाने लगे,मैं भरी बरसात में रोया तो सावन जल गया,एक और कवियत्री शिखा गर्ग ने गीत पढ़ा- छनकेगी बूंदों की पायल,जाने कब बरसेंगे बादल ओज के कवि वीरेंद्र तिवारी ने पढ़ा- देश प्रेम है धर्म हमारा हमें धर्म पर चलना है,देश प्रेम की खातिर हमने इस वर्दी को पहना है\  नईम ज़िया ने पढ़ा- दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए,ये भी दस्तूर है दस्तूर निभाते रहिए,बुन्देली भाषा के कवि सुरेश चंद्र त्रिपाठी ने पढ़ा- अस मिसारे घर के द्वारे मुर्गा बोले कुकड़ूँ कुं, जाम आलसी जीव परो धुँधवाये रहो है काये तू |  सिद्धार्थ त्रिपाठी ने पढ़ा- धार हो कृपाण जैसी लेखनी में जिसकी,समाज से ज्वलन्त प्रश्न करे वही कवि है| वरिष्ठ  कवियित्री माया सिंह ने पढ़ा,हमको इस दौर मे हर वक़्त संभलना होगा,है खतरनाक सफर होश में चलना होगा,अतिथि इफ्तखार अहमद ज़िला प्रोग्राम अधिकारी ने पढ़ा= ज़िन्दगी में वो कभी प्यार से देखा न पूछा,बाद मरने के मेरी कब्र पे रोने आए; पर खूब तालियां बजीं,संचालन कर रहे पहचान के अध्यक्ष कशफी जी ने पढ़ा- कमाल ये है कि खंज़र जिन्होंने मारा था, वही ये पूछ रहे कि घाव कैसा है| अतिथि जिला प्रोबेशन अधिकारी डॉक्टर अमरेंद्र जी ने पढ़ा-नफरतों के दौर में तुम प्रेम के दो बोल बोलो,मत किसी का दिल दुखाओ मत किसी पर व्यंग बोलोपर खूब वाह वाही लूटी |  वरिष्ठ कवि प्रेमनरायन दीक्षित ने पढ़ा- भाग्य भगवान की समीक्षा है,दर्द दे ले रहा परीक्षा है,उस्ताद शायर फारूक वफ़ा ने पढ़ा-  गमों का दौर है सीने के दाग़ जलते हैं,इन आंधियों में हमारे चिराग जलते हैं| फिर ज़िले श्रेष्ठ गीतकार पहचान के संस्थापक अध्यक्ष विनोद गौतम ने कई गीत पढ़े ,गरजे न यहां बादल बिजली न यहाँ कड़के,है दूर सजन मेरे रह रह के जी धड़के,अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे ज़िले के वरिष्ठ  साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी साहित्यकारों को अच्छे काव्यपाठ के लिए बधाई और आशीर्वाद दिया और पढा-व्याल डाह दुरमित्र प्रथम तो उनको ही डसते हैं,इनके अपने होते हैं और निकट बसते हैं |  इनके अलावा और साहित्यकारों ने अपना काव्यपाठ किया |  आखिर में पहचान संस्था के अध्यक्ष कशफी और अशोक होतवानी ने आये हुए सभी रचनाकारों और अतिथियों , श्रोताओं का  आभार व्यक्त किया |

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