देश में इस समय रेवड़ी संस्कृति के चलन पर बहस का बाजार गर्म है। भारतीय जनता पार्टी अपने नये प्रतिद्वंदी आम आदमी पार्टी से लगता है कि बहुत ज्यादा दहशत खा गई है। दिल्ली में राज्य के चुनाव में मोदी का जादू केजरीवाल के सामने हर बार न केवल फीका हो जाता है बल्कि उनके जादू का जोर किसी काम का नहीं रह जाता। उन्होंने दिल्ली में केजरीवाल की सरकार को पंगु बनाने के तमाम हथकंड़े इस्तेमाल करके देख लिये जिससे उनको उम्मीद थी कि काम न कर पाने के कारण वे लोगो की नजर में उतर जायेंगे और उनकी पार्टी धूमकेतु की तरह अस्त हो जायेगी लेकिन जिस तरह पंजाब में भी केजरीवाल का जादू चल गया उससे मोदी बहुत खौफजदा हो गये हैं। उन्हें आभास हो गया है कि अभी इसके बावजूद राष्ट्रीय पलक पर चींटी के मानिन्द ही अस्तित्व में बनी हुई आम आदमी पार्टी को नजरअंदाज करना निकट भविष्य में भारी पड़ सकता है। गुजरात में केजरीवाल ने अपने लिए जिस तरह संभावनायें बनाई हैं उसे मोदी ने बहुत गंभीरता से लिया है। अब उन्हें लग रहा है कि केजरीवाल और ज्यादा सिर उठायें इसके पहले उनकी पार्टी की भ्रूण हत्या के लिए पूरी ताकत से जुट जाना ही श्रेयष्कर है। उन्होंने उरई में बुन्देलखण्ड एक्सप्रेसवे के लोकार्पण के समय बिना किसी प्रसंग के रेवड़ी संस्कृति के मुद्दे को उछालकर नया विमर्श ढ़ाल दिया। इसके बाद जनहित याचिका बाज उनकी पार्टी के नेता अश्विनी उपाध्याय ने इस पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी ताकि यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस के केन्द्र में आ जाये भले ही इससे बहुत बड़े राष्ट्रीय मुद्दे मौजूद हों जिनके सामने यह मुद्दा वाक् विलास से ज्यादा की हैसियत न रखता हो।
संविधान के मुताबिक समाजवादी व्यवस्था कायम करना स्वाधीन भारत के निजाम का दायित्व है भले ही गद्दी पर किसी भी पार्टी की सरकार काबिज हो। इसके पहले भी भाजपा केन्द्र में परोक्ष तौर पर भी और प्रत्यक्ष रूप से भी कई बार सत्ता में रह चुकी है लेकिन इस प्रतिबद्धता के मामले में आम सहमति भंग करने का कोई प्रयास इसके पूर्व उसने कभी नहीं किया था। समाजवादी व्यवस्था से तात्पर्य है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति वह कितना भी साधनहीन क्यों न हो गरिमापूर्ण ढ़ंग से जीवन यापन करने के संवैधानिक अधिकार का वास्तविक रूप से उपभोग कर सके। इसके लिए सरकार को यह समझदारी बनानी पड़ेगी कि वह कोई कारोबारी संस्था नहीं है बल्कि बहुतायत में जो वंचित जनता है उसके हित में उसे कुछ दायित्व स्वयं निर्वाह करने पड़ेंगे। मसलन सरकार रोडवेज की जो बसे चलवाती है वह बेहद खस्ताहाल होती हैं। आज के युग में निम्न मध्यवर्गीय लोग तक इन बसों में सफर नहीं करते। इन बसों में कौन सफर करता है वह गरीब आदमी जिसके पास जीतोड़ मेहनत करने के बावजूद खाने के लाले हैं। वह अपनी रिश्तेदारी में या बीमारी से कितना भी असाध्य हो जाये किराये का चार पहिया वाहन लेकर बाहर जाने का खर्च अफोर्ड नहीं कर सकता। जाहिर है कि रोडवेज की बसों को लेकर सरकार की धारणा यह नहीं होनी चाहिए कि वो इसके माध्यम से कोई कारोबार कर रही है। लेकिन रोडवेज के टिकट पर जीएसटी वसूल करके वह जाहिर करती है कि उसके लिए रोडवेज सेवा का कार्य न होकर कोई व्यापार है। इसलिए इसमें व्यापार कर वसूल करने में उसे कोई हिचक शर्म नहीं होती। यह एक मिसाल भर है। सिर्फ जीएसटी की चर्चा की जाये तो सरकार इस तरह का अनर्थ कई मामलों में कर रही है भले ही वह कहे कि ऐसे मामलों में जीएसटी बहुत प्रतीकात्मक है लेकिन इससे सरकार की मानसिकता झलक जाती है। उसने अपनी कर प्रणाली को आम आदमी के अग्रेजी राज्य से भी ज्यादा क्रूर शोषण का रूप दे रखा है। भाजपा के समर्थक बड़े आदमी दिल्ली के चुनाव के समय कह रहे थे कि केजरीवाल को क्या हक है कि वह उनके टैक्स की आय से गरीबों को मुफ्त गरीबों को बिजली जलवाकर उन्हें गुलछर्रे उड़ाने का मौका दे रही है। यह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की मिसाल सामने लाता है। ये तथाकथित बड़े आदमी टैक्स दाता नहीं बल्कि टैक्स चोर हैं इसीलिए इनकम टैक्स देने वालों की संख्या बहुत कम है। जो हैं भी वह सीए से बाजीगरी कराकर जितना टैक्स देते नहीं हैं उससे ज्यादा टैक्स की चोरी करते हैं। जीएसटी का भी यही हाल है। कहा गया था कि जीएसटी लागू होने के बाद हर दुकानदार और व्यापारी को ग्राहक को पक्का बिल देना पड़ेगा लेकिन कहीं ऐसा हो रहा है। पक्का बिल क्यों नहीं दिया जाता क्योंकि जीएसटी के टैक्स की चोरी करनी है। यह देश महाशक्ति बनने के अरमान तो पालता है लेकिन किसी भी महाशक्ति कहे जाने वाले देश में कानून विहीनता की ऐसी स्थिति है जैसी देश में है। अगर इस देश में कोई गवर्नेंस होती तो खुल्लम खुल्ला छोटे शहरों तक में प्रतिदिन लाखों रूपये की बिक्री करने वाले दुकानदार अधिकारियों की दबोच में आये बिना रह सकते थे। अगर प्रशासन नाम की कोई चीज होती तो हर जिले में खाद्य सुरक्षा विभाग होते हुए भी हर खाद्य सामग्री मिलावटी बिकने पर देश के गौरव के आहत होने का दंश महसूस करके देश भक्त अधिकारी मिलावटियों को सींखचों के भीतर करके उन्हें लंबी सजा दिलाने में कोई कोर कसर नहीं रखते। लेकिन अधिकारी अगर अधिकार होते हुए भी हर मामले में निरूपाय बने हुए हैं तो इसकी वजह है कि उन्हें सरकार का अभयदान प्राप्त है। इसलिए अधिकारी कुछ ही दिनों की नौकरी में करोड़पति अरबपति बन रहे हैं फिर भी सरकारें धृतराष्ट्र बनी हुई उनके खिलाफ तमाम एजेंसियां होने के बावजूद जांच कराने से बचती नजर आ रहीं हैं। तथाकथित ईमानदार नेता केन्द्र और प्रदेश में बैठे हैं लेकिन उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है कि गरीब आदमी जो उन पर लगातार थोप जा रहे विभिन्न प्रकार के करों से अपनी जान बचाने की किसी सूरत में नहीं हैं उस पर रहम करने के लिए टैक्स चोरी और विकास कार्यों में बढ़ती कमीशनखोरी को रोके। उत्तर प्रदेश में बताते हैं कि आज तक के इतिहास में प्रधानों, ब्लाक प्रमुखों से लेकर स्थानीय निकायों के प्रमुखों तक ने कभी इतना धन नहीं कमाया जितना इस दौर में कमाया है। भ्रष्टाचार की यह छूट सरकार में बैठे लोगों द्वारा किसी लालच के बिना दी जा रही है क्या यह बात विश्वास करने लायक हो सकती है। ऐसे में सरकार कितना भी टैक्स लगा ले लेकिन उसकी पूर्ति नहीं हो सकती क्योंकि भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी सरकार का गडढ़ा कभी नहीं भरने देगी। उधर उत्तर प्रदेश में तो भ्रष्टाचार में लुटाने के लिए सरकार की आतुरता इस हद तक है कि उसने विधायक निधि बढ़ाकर पांच करोड़ रूपये कर दी है जबकि सभी जानते हैं कि यह निधि माननीयों के कितने ज्यादा दोहन का साधन है। साथ ही इस निधि का वास्तविक और तर्क संगत विकास से कोई संबंध नहीं है। यह निधि विकास के नाम पर केवल अपनों को उपक्रत करने का माननीयों के एक अधिकार का पर्याय भर है।
इसी तस्वीर का एक और पहलू देखें। एक तो टैक्स केवल उस आम आदमी से वसूला जा रहा है जो कि लगभग सर्वहारा है। बड़े आदमी टैक्स की चोरी को ही अपने मुनाफे का पर्याय बनाये हुए हैं और बैंक से भारी कर्जा लेकर उसे मार जाने का अधिकार भी उसे बड़े आदमी को प्रदत्त कराया गया है। दूसरी ओर आम आदमी को उसके काम का बाजिव मेहनताना मिले इसकी बजाय उसके मेहनताने को लगातार सिकोड़ने का काम किया जा रहा है। आउटसोर्सिंग इस शोषण का सबसे जघन्य रूप है जिसकी बदौलत इस युग में भी लोगों को केवल सात आठ हजार रूपये महीने पर काम कराने के लिए मजबूर किया जा रहा है जबकि इतने में वह खुद तक ढ़ंग का खाना नहीं खा सकता। क्या हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण ढ़ंग से जीने के मौलिक अधिकार की रक्षा का सरकार का यही तरीका है। अखबारों का ही उदाहरण ले लें। पहले जिन अखबारों के जिला संस्करण निकलते थे उनके जिला प्रमुखों को अगर वेजबोर्ड के मुताबिक वेतन नहीं मिल रहा था तो भी सम्मान जनक वेतन मिल जाता था जबकि तब जिले का पत्रकार अपने जिले में ही चीफ संवाददाता हो सकता था लेकिन आज आउटसोर्सिंग के जरिये जिला प्रमुख की नियुक्ति अखबार कर रहे हैं ताकि उन्हें नाममात्र का वेतन देना पड़े और वे बाहर के जिले के लोग होते हैं। क्या श्रम कानून के रहते ऐसा किया जाना संभव है क्योंकि जिला संस्करण वाले अखबार के चीफ रिपोर्टर का काम पूर्णकालिक है अस्थायी नेचर का नहीं और श्रम कानून कहता है कि पूर्णकालिक कर्मचारी को वेजबोर्ड के निर्धारण के मुताबिक वेतन भत्ते अनुमन्य होंगे लेकिन श्रम कानून तेल लेने गया। अब कोई श्रम अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा पाता क्योंकि अखबार मालिको पर सरकार मेहरबान है। उत्तर प्रदेश मे जब योगी जी मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने आयातित संस्कृति का प्रशिक्षण देने वाले पब्लिक स्कूलों पर पाबंदी कसने के संकेत दिये थे लेकिन बाद में वे इससे मुकर गये। ये स्कूल सांस्कृतिक अनाचार भी फैला रहे हैं और फीस, किताबें, ड्रेस आदि में मनमानी चला रहे हैं और इनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों को बहुत मामूली वेतन दिया जा रहा है जिससे सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की तुलना मंे इनकी योग्यता क्या होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या सरकार इन स्कूलों पर सख्ती करने से इसलिए डर रही है कि इनके संचालक अपने स्कूल बंद कर देंगे। अगर ऐसा होता है तो यह उनकी बड़ी मेहरबानी होगी। पब्लिक स्कूलों के परिदृश्य से हट जाने पर सरकारी स्कूलों की वीरानी समाप्त हो जायेगी और सरकारी स्कूलों में सुपर टेट पास करके आये अत्यंत योग्य शिक्षकों से उन्हें बेहतर शिक्षा भी मिल सकेगी साथ ही आयातित संस्कृति के प्रकोप से वे बचेंगे जो विलासी मानसिकता का प्रादुर्भाव करके छात्रों में हर तरह की नैतिकता समाप्त करने के विष वृक्ष का रोपण कर रही है।
सरकार यह भी दिखाती रहती है कि उसने पहले की तुलना में कितने अधिक जीएसटी की वसूली की लेकिन इससे क्या। उसको आम आदमी से लिये जाने वाले टैक्स बढ़ाने पड़ रहे हैं, सरकारी नौकरियां कम करनी पड़ रही हैं, कर्मचारियों के वेतन आयोग के गठन को रोकना पड़ ेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेपड़ रहा है। अगर लोगों को दिखे कि जो भी सामान वह खरीदते हैं उसका पक्का बिल उन्हें मिलता है तो उन्हें यह भी लगेगा कि गवर्नेंस अब आ गई है। दूसरे सरकार की जीएसटी से आय भी बढ़ेगी। दूसरे तरह के प्रत्यक्ष टैक्सों में भी सरकार इसी तरह मुस्तैद हो जाये तो उसे अपने खर्च के लिए और भरपूर पैसा मिलने लगेगा। नीतिगत तौर पर बहुत ज्यादा मदों में टैक्स लगाने से भले ही वह बहुत कम हो लोगों में मनोवैज्ञानिक बेचैनी पनपती है। साथ ही टैक्स सक्षम लोगों पर लगाया जाना चाहिए निरीह जनता पर नहीं।
इसलिए अगर आपकी कर प्रणाली और श्रम कानूनों को पंगु बनाने की वजह से आम लोग अपने अस्तित्व के लिए तरसने लगे हैं तो आपको बुनियादी सुविधाओं की उसके लिए व्यवस्था को आगे आना होगा। बिजली और पानी भी इसमें शुमार है। इसलिए इसे रेवड़ी बांटना नहीं कहा जा सकता। होना तो यह चाहिए कि सभी राज्य अनुदानित दर पर या पूरी तरह मुफ्त सीमित बिजली का प्रबंध लोगों के लिए करें न कि रेवड़ी का नाम देकर इसे प्रतिबंधित करने की कोशिश की जाये। दिल्ली में इन सुविधाओं के साथ-साथ चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र. में भी लोगों को भगवान भरोसे छोड़ने की बजाय सरकार पूरी जिम्मेदारी उठाने के संकल्प के साथ आगे आ रही है। इसलिए शातिर अड़ंगेबाजियों से बाज आकर लोक कल्याण की वास्तविक भावना से देश के कर्ता धर्ताओं को अपनी नीतियों का परीक्षण करके उन्हें पुर्न व्यवस्थित करना चाहिए। भाजपा की सरकार ने भी कई मोर्चों पर बेहतर काम किया है जैसा कि सुरक्षा का काम लेकिन गरीब जनता के प्रति उसकी संवेदनहीनता उसके सारे पुण्यों को मटियामेट कर सकती है। मुफ्त राशन बांटने और शौचालय आदि बनवाने से वह गरीबों के मामले में नीतियों के स्तर पर जो त्रुटियां हैं उनके अपराधों से बरी नहीं हो सकती। देर सबेर बहस के केन्द्र में तथाकथित रेवड़ी संस्कृति नहीं बल्कि यही मुद्दे होंगे।







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