उरई | दिव्यांगों की दशा बेहद खराब है वे खुद तो जीवट दिखा पा रहे हैं लेकिन सरकारी विभागों से मदद तो दूर उन्हें हमदर्दी तक नहीं मिलती उनके उत्थान और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाई जा रही योजनाएं कागजी साबित हो रही हैं यहां तक की दिव्यांग जनों को  दिव्यांगता का प्रमाण पत्र बनवाने तक में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं यह निष्कर्ष दिव्यांगों के जिले में किए गए एक सर्वे में सामने आए जिसे नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन आफ एंप्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल (एन सी पी ई डी पी) के फेलो जाविद खान ने कई गांव में जाकर दिव्यांगों की स्थिति का नजदीकी से अवलोकन करने के बाद तैयार किया है |

 ग्राम पंचायत चुर्खी के निवासी आजाद शाह एक उदाहरण है जो एक सड़क दुर्घटना के बाद एक पैर से पूरी तरह अपाहिज हो गए उन्होंने दिव्यांगता प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए संबंधित कार्यालयों के न जाने कितने चक्कर लगाए लेकिन सुविधा शुल्क ना दे पाने के कारण आज तक दे प्रमाण पत्र हासिल करने में सफल नहीं हो पाए हैं जिससे दिव्यांग कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित हैं दुर्घटना के पहले आजाद शाह मिस्त्री थे और प्रतिदिन उनको काम मिलने पर ₹600 तक की आमदनी हो जाती थी लेकिन अब वे गुजारे के लिए छोटी सी दुकान चला रहे हैं जिसमें मामूली बिक्री हो पाती है और सौ – दो सौ  की बचत हो जाए तो भी बड़ी बात है प्रमाण पत्र ना होने के कारण उन्हें तकनीकी कौशल के प्रशिक्षण में वरीयता नहीं मिल पा रही जिससे चाह कर भी वे कोई प्रशिक्षण ले पाने में अभी तक कामयाब नहीं हो पाए हैं वरना उनकी आमदनी बढ़ जाती |

 इसी गांव के राम मूरत हैं जिनकी कमर के नीचे का पूरा हिस्सा अज्ञात व्यक्तियों द्वारा चलाई गई गोली लगने से बेकार हो गया इसके बाद उनका जीवन नारकीय बन गया है वे ऑटो चला कर अच्छी खासी कमाई कर लेते थे लेकिन अब पत्नी पर निर्भर है परिवार में 4 बच्चे भी हैं इसलिए पत्नी को घर का खर्चा चलाने में कितनी मुसीबत झेलनी पड़ती होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है मेरा दिव्यांग प्रमाण पत्र केवल 40% दिव्यांग प्रमाण पत्र का बनाया गया है जिससे उन्हें योजनाओं का लाभ अच्छी तरीके से नहीं मिल पा रहा |

हालांकि 32 वर्ष के राम मूरत दिलेर आदमी है और व्यहार कुशल भी इसलिए क्षेत्र पंचायत सदस्य चुने गए हैं इन्हें सरकार से ट्राई साइकिल की गुजारिश है लेकिन अधिकारी मदद करें तब ना |

मुसमरिया के राजू 17 वर्ष पहले लकवे की चपेट में आ गए थे जिससे इनके हाथ पैर सुन्न पड़ गए और इसके बाद इनकी जिंदगी तबाह हो गई वर्तमान में इनके पुत्र की उम्र 22 वर्ष हो चुकी है जबकि पुत्री 18 वर्ष की है कोई रोजगार ना होने से इनको अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाए और ना ही बेटा –  बेटी किसी जगह रोजगार में एडजस्ट नही हो पा रहे हैं सारा दारोमदार राजू की छोटी सी दुकान पर है जिससे दिन भर में डेढ़ सौ रुपए की आमदनी ज्यादा से ज्यादा होती है इन्हें भी सरकार से अभी तक कोई सार्थक मदद नहीं मिली है |

कालपी तहसील के ग्राम सोहरापुर के रहने वाले हरवंश कुमार की स्थिति भी सोचनीय है जब वे 9 वर्ष के थे बीमार हो जाने के कारण उनके दोनों पैरों को फालिस (लकवा ) मार गया वे 95% दिव्यांगता का शिकार है उनकी शिक्षा इंटर तक हुई है अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उन्होंने इलेक्ट्रिशियन का कोर्स किया लेकिन जब खुद की दुकान रखने के लिए बैंक से लोन लेना चाहा तो गारंटी के नाम पर उन्हें टरका दिया गया जबकि मुद्रा लोन योजना में जिसके अंतर्गत उन्हें कवर किया जाना चाहिए किसी गारंटर की जरूरत नहीं होती है | हरवंश अपने भरण-पोषण के लिए छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं इनके पिता राजमिस्त्री थे लेकिन उनका भी धंधा बंद हो चुका है हरवंश की जिंदगी बड़ी मुश्किलों में कट रही है

 मंगरोल के जितेंद्र कुमार फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी का अच्छा खासा काम झांसी में करते थे लेकिन एक दिन उनका मोटरसाइकिल से जाते समय एक्सीडेंट हो गया जिसमें उन्हें गंभीर चोटें आई दाहिना पैर पूरी तरीके से वेकाम हो गया 2 वर्ष तक वह चल नहीं पाए शिक्षा के नाम पर केवल मैट्रिक पास है परिवार में पत्नी के अलावा दो लड़कियां और एक लड़का और माता-पिता भी है 70% दिव्यांगता के बावजूद उन्हें स्वरोजगार के लिए कोई सरकारी सहायता नहीं मिल पा रही है उन्होंने अपने बूते एक छोटी सी दुकान गांव में ही कर रखी है जिससे ₹200 रोज की आमदनी हो जाती है इसी आमदनी से पूरे परिवार का खर्चा चल पा रहा है

 यह  जाविद के विस्तृत अध्ययन के नमूने हैं जबकि दास्ताने बहुत ज्यादा है जो संवेदनशील व्यक्ति को रुला सकती हैं लेकिन क्या सरकार इस अध्ययन से सबक लेकर दिव्यांगों की ठोस मदद के लिए कुछ करने की इच्छा शक्ति रखती है |

Leave a comment