संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने विजय दशमी भाषण में हिन्दू समाज से दलितों के साथ भेदभाव से बाज आने की जोरदार अपील की। हिन्दुत्व की छतरी तले आपसी गले शिकवे भूलकर सारी जातियां एक छतरी के नीचे आ जाने से भाजपा को सारे देश में ऐतिहासिक राजनीतिक सफलता मिलना संभव हुआ है लेकिन अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि एआत्मकता की इमारत अभी स्थायी नहीं है। इसमें दरकन के आभास ने संघ को विचलित कर दिया है और अपने इसी भाषण में प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर तारीफ करने वाले संघ प्रमुख ने समय रहते इसकी मरम्मत का उद्यम कर डाला है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार गठित होते ही काशगंज में दलित दूल्हे को घोड़े पर बैठने से रोकने के प्रयास के मामले ने तूल पकड़ा था। लेकिन उस मौके पर संघ ने सवर्णों को हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित करने का प्रयास करने की बजाय चुप्पी ओड़े रहने में ही कुशलता समझी। इसके बाद देश भर में ऐसे कई प्रसंग सामने आये जिनको संघ ने कभी नोटिस में नहीं लिया। पर कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी की दक्षिण की दिग्विजयी पदयात्रा के बीच दलित राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के आजमाये गये पैंतरे से संघ को बड़ी मुश्किल से बुनी जा सकी हिन्दुत्व की छतरी में सुराख उभर आने का खतरा सता उठा है और संघ प्रमुख के दशहरे पर संबोधन में इसकी झलक उन्होंने दिखा दी।
संघ घोषित तौर पर भले ही महात्मा गांधी की भी अभ्यर्थना करता हो लेकिन उसके वैचारिक अभियान से महात्मा गांधी के प्रति घृणित भावनायें संचरित हो रही हैं जो व्यापक रूप लेती जा रही हैं। जबकि महात्मा गांधी पक्के वैष्णव थे और वर्ण व्यवस्था के प्रति भी उनकी आस्था थी जिसको लेकर उनके और बाबा साहब के बीच शास्त्रार्थ हो चुका था। बाद में महात्मा गांधी ने समझा कि समयानुकूल लचीलापन अपनाकर ही वर्ण व्यवस्था को बचाया जा सकता है तो उन्होंने अछूतोद्धार जैसे अभियान छेड़ दिये। उन्होंने संघ की तरह इस मामले में केवल वत्सल भाव से प्रवचन देते रहने तक अपने का सीमित नहीं किया बल्कि यह आभास दिलाने के लिए कि वे वर्ण व्यवस्था को बदलना चाहते हैं इसके लिए हस्तक्षेपकारी ढ़ंग से पेश आये। महात्मा गांधी का यह स्वभाव था कि वे जिस सुधार की भी बात करते थे उसकी पहल के लिए खुद कर्म के स्तर पर आगे बढ़ने में कंजूसी नहीं बरतते थे। जैसे उन्होंने स्वदेशी और लघु कुटीर उद्योगों की बात की तो विदेशी कपड़ों की होली कुलीनों से जलवा दी और सभी को चरखा कातने में लगा दिया। वर्ण व्यवस्था को हिलाने के नाम पर 1945 के बाद उन्होंने सिर्फ उन्हीं विवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देने की शर्त लगा दी जो अंतरजातीय या अंतरधार्मिक हों। उन्हीं के सामने कांग्रेसियों के बारे में सत्ता का दोहन करके रूपये बटोरने और परिवार को राजनैतिक व आर्थिक लाभ देने के आरोप सामने आ गये थे तो उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की बात कहना शुरू कर दी थी। संघ विचार और कार्य के बीच ऐसे समन्वय के लिए कोई उपक्रम नहीं दिखा सका है।
यहां तक कि मोदी सरकार वन के तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री थावर चन्द्र गहलोत तक ने एक कार्यक्रम में कह दिया था कि दलित जिस मंदिर को बनाते हैं उसमें पूजा शुरू हो जाने के बाद घुस तक नहीं पाते, जिस तालाब में खोदते समय पेशाब करते हैं उसका बाद में पानी नहीं पी पाते। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को दलित होने के कारण जब जगन्नाथ मंदिर में धकियाया गया था तो दलितों को कितनी पीड़ा हुई थी। उस समय अगर संघ प्रमुख घटना की निंदा न करके अफसोस भी जाहिर कर देते तो दलितों को बड़ी सांत्वना मिलती। पर वे निर्विकार बने रहे।
अब उन्हें लगा है कि सिर्फ सुभाषित बोलने से काम चलने वाला नहीं है, जो सूक्त वाक्य वे बोलते हैं वे सामाजिक जीवन में उतरें इसकी पहल भी उन्हें करनी होगी। ज्ञान योग को कर्म योग में बदलने का कर्तव्य निभाना उनकी जिम्मेदारी है। इस कारण उन्होंने विजय दशमी संबोधन में खुलकर कहा कि दलितों को घुड़ चढ़ी से रोकने जैसे काम स्वीकार्य नहीं हैं। भारतीय समाज की अपनी विशेषता है। यहां सुधार या परिवर्तन के लिए क्रांतिकारी प्रयास फलीभूत नहीं होते। बहुत से जज्बाती युवा आज कहने लगे हैं कि आजादी तो अहिंसा के आंदोलन से नहीं अपितु भगत सिंह और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जैसे लड़कों के कारण संभव हुई जबकि अगर वे आज होते और जिन विचारों के हामी थे उनकी बात आज करते तो ये दोंनो महापुरूष अर्बन नक्सली घोषित कर दिये जाते। भगत सिंह और नेता जी का बलिदान महान था देश जिनका ऋणी रहेगा लेकिन क्रांति के लिए साथ चलने को भगत सिंह को करोड़ों की जनता वाले देश में सैकड़ों की संख्या में भी लोग नहीं मिल पाये थे। गांधी जी के अहिंसक आंदोलन के कारण गुलामी का जुआ उतार फेंकने के अभियान में देश का बच्चा-बच्चा शरीक हो गया तो अंग्रेजों को लगा कि अब इस देश में उनका शासन चल नहीं पायेगा क्योंकि उनके खिलाफ जन बगावत के आसार बन गये। यही सीमायें वर्ण व्यवस्था के खिलाफ उग्र और कट्टर अभियान चलाने वालों की रहीं हैं जो एक स्तर पर पहुंचकर दम तोड़ देने के लिए अभिशप्त हैं। इस देश में परिवर्तन क्रांतिकारी नहीं सुधारवादी प्रयासों से होते हैं इसलिए संघ के वर्ण व्यवस्था के रूपांतरण के प्रयास से अधिक उम्मीद की जाने लगी है और भाजपा के पीछे उपेक्षित जातियों का भी लामबंद होना इसीलिए संभव हुआ है। इस मामले में भाजपा ने कांग्रेस का स्पेस हथिया लिया है। कांग्रेस ने भी सुधारवादी प्रयासों से वर्ण व्यवस्था की लगाम को ढ़ीला करके सत्ता में दलितों को हिस्सेदारी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसे नकारा नहीं जाना चाहिए।
सहभोज जैसे आयोजन से अस्पृश्यता की तरह की जहरीली भावनाओं का शमन करने में संघ ने बड़ा योगदान दिया। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का समय-समय पर बाल्मीक समाज की कन्याओं के चरण पखारने के अभूतपूर्व काम भी संघ की प्रेरणा के प्रतिफल हैं। देश के सर्वोच्च पद लगातार समाज के अंतिम छोर के लोगों के हवाले करने जैसे प्रतीकात्मक कदमों को भी कम महत्व नहीं है जिससे पद और शक्तियां देने को लेकर समाज में प्रचलित वर्जनाओं का अंत किया जा सका है। हालांकि ये पद केवल उत्सव मूर्ति के बतौर हैं जिनमें निर्णय की शक्तियां निहित नहीं हैं।
पर विरोधाभास यह है कि धर्म के नाम पर उस साहित्य और संस्कृति का पुनरूत्थान किया जा रहा है जो ऊंच-नीच की कट्टरता के संवाहक हैं। आश्चर्य यह होता है कि ईश्वर के नाम पर इसका औचित्य साबित करने की कोशिश की जाती है जबकि यह ईश्वरी निजाम जिसे नास्तिक कुदरती निजाम का नाम देते हैं के ही खिलाफ है। धर्म के नाम पर यह कहने का साहस कैसे किया जा सकता है कि शूद्र कितना भी गुणी होने के बावजूद सम्मान का पात्र नहीं हो सकता। ऐसी उदघोषणायें करने वाले ईश्वर विरोधी यानी अपराधी हैं। ईश्वर ने कुदरती निजाम के माध्यम से व्यक्तिगत गुण अवगुण दिये हैं, सामूहिक देने का कोई विधान नहीं है। विज्ञान भी कहता है कि नस्ल के आधार पर कोई मेधावी या पराक्रमी नहीं होता। किसी कातर प्रवृत्ति के व्यक्ति के घर अत्यंत बहादुर संतान पैदा हो सकती है और किसी महा विद्वान का बेटा मूर्ख हो सकता है इसलिए गुणी व्यक्ति समाज को सौंपी गई ईश्वर की धरोहर है। अगर जाति के आधार पर गुणी को हमने तिरस्कृत किया तो समाज उसकी लाभकारी देन से वंचित रह जायेगा जो समाज से भी द्रोह होगा और देश से भी।
जन्मना किसी को हेय और किसी को श्रेष्ठ मानने की गलत समझ समाज के लिए घातक कुरीतियों के रोपण का कारण बन रही है। कल्पना कीजिये कि किसी जगह 10-15 बुजुर्ग लोग बैठे हुए हैं और उनमें सवर्ण भी हैं और दलित भी। कोई सवर्ण किशोर या नौजवान आता है चेहरा चीन्ह-चीन्हकर अभिवादन करने लगता है। सवर्ण बुजुर्ग के चरण स्पर्श कर लेता है लेकिन उससे भी कम उम्र के दलित बुजुर्ग से केवल नमस्कार से काम चला लेता है। जबकि जिस सवर्ण के वह चरण स्पर्श कर रहा होता है उसमें तमाम ऐब भी होते हैं जबकि दलित बुजुर्ग जिसमें गुण शील सबकुछ है उसे वह खुले तौर पर द्वोयम दर्जे का घोषित करता है। क्या इससे दलितों का स्वाभिमान आहत नहीं होता। क्या इसी के कारण दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढ़कर निकलने को गंवारा न करने की प्रेरणा दूसरों को नहीं मिलती।
सामाजिक समरसता मात्र से काम चलने वाला नहीं है। मानवता वादी इस युग में जाति व्यवस्था अप्रासंगिक हो चुकी है। दलितों और पिछड़ों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाले काम अगर सामाजिक शिष्टाचार के नाम पर जारी रखे जायेंगे तो हिन्दु समाज की एकजुटता प्रवंचना सिद्ध होगी। इस किस्म के शिष्टाचार से ही दलितों के तिरस्कार और उत्पीड़न की शुरूआत होती है। चूंकि संघ हिन्दू एकजुटता के लिए समर्पित है इसलिए संघ प्रमुख को इन पहलुओं पर ध्यान देना होगा और कारगर बदलाव के लिए हिन्दू समाज को कड़वी दवा पिलाने को आगे आना होगा। विजय दशमी संबोधन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बाबा साहब को भी उद्धृत किया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने सामाजिक स्वतंत्रता की बात कही थी लेकिन बाबा साहब ने सामाजिक स्वतंत्रता नहीं सामाजिक लोकतंत्र की जरूरत बतायी थी जिसमें कुछ भाजपा शासित राज्यों की तरह न हो कि अमुक अधिकारी शूद्र जाति से संबंधित है तो वह बड़े जिले के योग्य नहीं हो सकता, डीजीपी या मुख्य सचिव के पद के योग्य नहीं हो सकता। चूंकि हमारी तथाकथित धार्मिक किताब में यह लिखा है। सामाजिक स्वतंत्रता का मतलब है किसी को भी कहीं तक भी पहुंचने का अवसर जैसा कि भाजपा ने प्रधानमंत्री के पद के मामले में करके दिखाया है। यह मानकर कि तथाकथित धर्माचार्य कुछ भी कह गये हों पर गुणी शूद्र को सम्मान देकर उसका लाभ उठाने में हम नहीं हिचकेंगे और इस बंदिश से परे रहने के कारण ही वह देश को अत्यंत सक्षम नेतृत्व देने में सफल रही है।








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