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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भयावह परिणाम को देखते हुये संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया गया था जिसका प्रमुख उद्देश्य भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुर्नरावृत्ति रोकना था । संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये समय समय पर अनेक कदम उठाये गये। उनमें एक स्वयं सेवी समूहों का गठन करना भी था जिसके लिये संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अन्तराष्ट्रीय स्वयं सेवक दिवस की घोषणा भी 1996 में की गयी जो पूरे विश्व में मनाया जाता है।
अगर हम भारत में स्वयं सेवा की बात करें तो आर्यावर्त मानव सभ्यता के उदय के साथ-साथ स्वयं सेवा की भावना का विकास हुआ जिसमें लोग घने जंगलों में एक दूसरे की निस्वार्थ मदद के चलते ही जीवन यापन सुरक्षित रहकर कर सकें।
स्वयं सेवा मदद करने का ही एक रूप है जिसमें लोग सक्रिय रूप से दूसरों की जरूरत में सहायता करने योग्य अवसरों की तलाश करते है और दूसरों की सहायतार्थ काफी लम्बे समय तक प्रतिबद्ध भी रहते थे। समय के बदलते क्रम में लोगों में स्वयं सेवा की भावनाओं में कमी आयी परन्तु अक्सर यह देखा जाता है। कि किसी विशेष घटनाक्रम के उपरांत लोगो में स्वयं सेवा का स्तर भी बढ जाता है चाहे वह संयुक्त राज्य अमेरिका में हुये 11 सितम्बर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद का दृश्य हो या भारत में 26/11 के आतंकवादी हमले के बाद का हर जगह का नागरिक विशेष बडी घटनाओं के बाद स्वयं सेवा की ओर उन्मुख हो उठता है जिसका वर्तमान उदाहरण कोरोना जैसी महामारी के दौरान देखने को मिला । वैसे भारत में स्वयंसेवीकरण एक सामाजिक आन्दोलन बन गया और महीनों तक लॉक डाउन मेें भारत के छोटे छोटे शहरों तक में लोगों ने तन मन धन से मदद के लिये तरसते लोगों को हाथ पकडकर सहारा दिया । संघीय सरकार भी स्वयंसेवा की भावनाओं को विकसित करने के लिये विभिन्न कार्यक्रमों को आयोजित कराती रहती है। जिसके लिये युवाओं को आपदा राहत मित्र बनाकर आपदा राहत बचाव कार्य सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाना है तो नेहरू युवक संगठन और एनएसएस के माध्यम से ग्रामीण एवं स्कूली बच्चों के अन्दर स्वयं सेवी भावनाओं को पनपाना हो ।
जब बात स्वयं सेवा की चल रही है तो भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जिक्र के बिना पूरी नहीं हो सकती है। 1925 की विजयदशमी पर डा0 हेडगेवार द्वारा स्थापित किये गये इस संगठन का उद्देश्य ही शैक्षिक तौर पर लोगों द्वारा देश के विकास में योगदान करना था । प्रारंभिक दौर में कांग्रेस भी राजनैतिक कार्यो की सफलता के लिये रचनात्मक सामाजिक कार्यो को अनिवार्य मानती थी लेकिन बाद में वह अपनी विभूतियों के रास्ते से भटक कर केवल राजनैतिक कार्यक्रमों तक सिमट गयी परन्तु आरएसएस आज एक शताब्दी का सफर पूरा करने के बाद भी इसके स्वयं सेवक अलग अलग मंचो पर निस्वार्थ सेवा कार्यो में जुटे है।
भारत विभाजन के समय 3 हजार से अधिक राहत शिविरों की स्थापना हो या 1962 के चीन युद्ध एवं 1965 के पाकिस्तान के साथ हुये युद्ध में रसद वितरण , टैªफिक कानून व्यवस्था सम्भालना हो यह सब कार्य संघ के स्वयं सेवकों के सहयोग से पूरी हो सके।
यह कोई आवश्यक नहीं है कि स्वयं सेवा किसी संगठन से जुडकर ही की जा सकती हो। यह तो किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी भी जगह कभी भी की जा सकती है। जिसका उदाहरण तो स्वयं द्वारिकानाथ शान्ताराम कोटणीश हैं। 1938 में चीन जापान युद्ध के दौरान चीनी सेना की मदद करने अन्य 4 चिकित्सकों के साथ चीन गये हुये थे जहां उन्होंने युद्ध में घायल हुये 800 से अधिक चीनी सैनिकों का इलाज किया था जिसमें 500 से अधिक सैनिकों की सर्जरी भी शामिल थी उनकी विशेष उपलब्धि चीन में पहले प्लेग का इलाज ढूढने की रही जो उस समय चीनी लोगों की मौत का प्रमुख कारण बनता जा रहा था। ऐसे अनेकों उदाहरण जिनमें स्वयं सेवा उत्कृष्टता के पैमाने पर जाकर खरी हो जाती है और किसी भी देश के विकास में अभूतपूर्व योगदान देती है। देश के संघीय सरकारों को भी स्वयं सेवा विकसित करने के लिये विभिन्न प्रयास करते रहना चाहिये क्योंकि वर्तमान में चल रही कुछ योजनाओं में प्रमुखता से यह देखा जा रहा है अंक पत्र में अपने नम्बरों को बढाने के लिये छात्र छात्रायें स्वैच्छिक कार्य में खाना पूर्ति कर रहे तो स्वयं सेवी योजनाओं का कार्य धरातल पर सिर्फ फोटो खिचाने तक सीमित रह गया है। सरकारों को चाहिये कि वह छात्र जीवन से ही युवाओं के बीच स्वयं सेवा के पाठ को अनिवार्य करे जो नौकरी में उनके नवाचारों के चलते प्रमोशन इत्यादि में भागीदार बनें । सेवा निवृत्ति के उपरांत भी लोग इस देश में स्वैच्छिक सेवा करें तो सरकार उन्हें सम्मान पत्र जारी करें ताकि उनका उत्साह वर्धन हो और सभी पेंशन धारक इसके लिये प्रेरित हों ।








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