प्रधानमंत्री की कौन सी कलाबाजी से पस्त है विपक्ष


नागपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागपुर से बिलासपुर तक चलने वाली वन्दे मात्रम ट्रेन को हरी झण्डी दिखाते हुये कहा वह एक गलत धारणा बनाने का उनके पिछले कई भाषणों से जारी सिलसिले की एक कडी है जिसका प्रतिवाद होना चाहिये क्योंकि इस बावत कोई गलत धारणा मजबूत हुयी तो देश की बहुतायत गरीब जनता के हितों पर चोट होगी।
     प्रधानमंत्री में एक कला है कि उन्हें संदर्भ से काटकर किसी बात को तूल देना हो या गलत धारणाओें को फैलाना और मजबूत करना हो अपनी राजनीतिक सुविधा के लिये वे यह काम इतने करीने से करते है कि लोगों का ध्यान  सामने दिखाई देने  वाली सच्चाई से ऐसे बट जाता है जिसे कि मुहावरे और कहावतों में आखों से अंजन चुरा लेने की बाजीगरी के बतौर परिभाषित किया जाता है। जैसे कि कांग्रेस अध्यक्ष खडगे के रावण सम्बन्धी बयान को जिसने भी पूरा सुना होगा उसे मालूम होगा कि उन्होंने प्रधानमंत्री के लिये कोई ऐसी बात नहीं कही थी जिसमें किसी तरह की बेहूदगी झलके लेकिन उसे संदर्भ से अलग करके मोदी ने गुजरात के बेटे को कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा अपमानित किये जाने का विलाप करके राज्य विधानसभा चुनाव को वास्तविक मुददों की पटरी से उतार कर मतदाताओं के लिये भावुक माहौल बना दिया जिसे वे अपनी पार्टी के पक्ष में भरपूर तरीके से भुना सके । इसके पहले के चुनावों में भी चाहे वह मणिशंकर अय्यर का बयान हो या चैकीदार चोर है का राहुल गांधी का नारा सबका ऐसा मलीदा बनाया कि बेतुके मुददे ने चुनाव के केन्द्र में जगह बना ली और यथार्थ बातें दर किनार हो गयीं ।
       प्रधानमंत्री की मुफ्त राजनीति के खिलाफ लगातार सिंह गर्जना का मर्म भी समझा जाना चाहिये जबकि वह खुद राशन की दुकानों से गरीबों को फ्री गल्ला आदि बटवाकर खुद भी मुफ्त की राजनीति करने में ही लगे हैं और इससे भरपूर चुनावी कमाई करने में सफल हुये हैं। लेकिन उन्हें केजरीवाल की मुफ्त बिजली देने की लोगों को आकर्षित करने मे सफल हो रही घोषणा इतनी चुभ गयी है कि वे हाथ थोकर तथाकथित शाॅर्टकट राजनीति के पीछे पड गये हैं । उनके द्वारा केजरीवाल को चुनौती के रूप में संज्ञान में लेना अपनी ही बेइज्जती कराने के बराबर है क्योंकि केजरीवाल की हैसियत दिल्ली और पंजाब मेें कुल मिलाकर डेढ मात्र सरकार बना लेने के बाबजूद भाजपा की तुलना में बेहद अदनी है। वजह यह है कि दिल्ली में तो सरकार का वजूद किसी नगर महापालिका के मेयर से भी कम है, उसे केन्द्र ने उप राज्यपाल के सामने पूरी तरह पंगु बना रखा है, पंजाब में भी उनकी सफलता भाजपा के लिये किसी तरह की क्षति न होकर कांग्रेस के लिये चिन्ता का विषय है फिर भी बौखलाये मोदी जा रहे हैं।
     लेकिन सवाल केजरीवाल या किसी और का नहीं है, प्रश्न उस नीतिगत मुद्दे का है जिसके कारण मानवीय सभ्यता समाज और राज्य की ओर बढी । यह संस्थायें उस आवश्यकता की उपज हैं जो सर्वोत्तम की उत्तरजीविता के कुदरती चरित्र के बरक्स देखी गयी जिसमें समर्थ लोगों के साथ कमजोरों की अस्तित्व रक्षा भी सुनिश्चित किया जाना नैतिकता के तकाजे के तहत मान्य किया गया। राज्य नाम की संस्था के माध्यम से यह व्यवस्था की गयी कि सरकारें समृद्ध और साधन सम्पन्न तबकों से योगदान वसूलें ताकि गरीबों और अन्य कमजोर वर्ग को गरिमा पूर्ण ढग से जीवन यापन का अवसर देने के लिये उन्हें मदद पहुंचा सके ।
      सरकार के वजूद के पीछे इसी बुनियादी सोच के दृष्टिगत अभी तक हर सरकार साधन सम्पन्न तवके से पर्याप्त करों की उगाही करती रही है ताकि जिनकी आमदनी नाकाफी है उन्हें जीवन स्तर बेहतर करने में अनुदान के माध्यम से मदद दे सके जैसे कि घरेलू गैस आदि का अनुदानित होना । यह अलग बात है कि इस तरह के अनुदानों का  फायदा उन लोगों को भी उठाने का अवसर दिया जाता रहा जो इसके पात्र नहीं होते थे लेकिन इसके लिये गरीब जनता नहीं सरकार ही जिम्मेदार थी जिसने ठीक काबलियत दिखाने की कोशिश नहीं की थी । लेकिन सरकार ने हर परिवार को जीवन की बेहतरी की पूरी व्यवस्थायें जुटाने के पहले ही उनकी मदद से हाथ खींच लिये जबकि अपने खजाने का मुंह समृद्धि के एवरेस्ट कहे जाने वाले तबकों को लुटाने की ओर मोंड दिया ।
     सरकार को करना तो यह चाहिये था कि हर परिवार आय इतनी सुरक्षित कर दी जिससे वह हर मामले में मोहताज स्थिति से उबर जाता लेकिन एक ओर तो हर तरह का अनुदान समाप्त करके प्रत्येक साधन बाजार की दर पर हासिल करने की बाध्यता पैदा की गयी दूसरी ओर आमदनी के मामले में उल्टी गंगा बहाते हुये सरकारी गैर सरकारी सभी क्षेत्रों में आउट सोर्सिग जैसी प्रथाओं को लांदना शुरू कर दिया जिनमें मेहनताने का कोई मानक नहीं है और न्यूनतम वेतन अधिनियम जैसी व्यवस्थाओं का तो कोई मतलब ही नहीं समझा जा रहा है।
     सरकार के उकसावे पर जो तथाकथित करदाता अपने कर को मुफ्त की राजनीति के लिये लुटा देने की बात कहकर आॅखें दिखाने में लग गये हैं उन्हें भी बेनकाब किया जाना जरूरी है। वे करदाता है या कर चोर । जो आयकर देते है वे जितना कर उनसे वसूल होता है उससे कई गुने की चोरी को सीए के माध्यम से गलत दस्तावेज तैयार करके अंजाम देते हुये पाये जाते हैं। इसी तरह जीएसटी में भी आवक से कई गुना सरकार को चूना लगाये जाने की स्थिति है। सही बात तो यह है कि उस मोहताज आदमी को कर वसूली के मैदान में बिना कवच कुण्डल के उतार दिया जाता है जिसे टैक्स का एक एक पैसा इस वजह से देना पडता है। अब पेट्रोल का ही उदाहरण लें जिसकी कीमतें कई तरह के सेस थोपे जाने के कारण आसमान पर हैं और इसके सबसे ज्यादा उपभोक्ता कौन है वे गरीब जिनको थोडी बहुत कमाई के लिये बाइक अनिवार्य रूप से चलानी पडती है क्योंकि इसके बिना वह समय पर अपने कार्यस्थल पर नहीं पहुंच सकते । इसी तरह कई और वजह हैं जिनके चलते गरीब आदमी के लिये भी बाइक चलाना अनिवार्य हो गया है। तो जाहिर है कि पेट्रोल में मनमानी टैक्स वसूली करके सरकार उन गरीबों से उगाही कर रही है जिनको मदद के लिये बुनियादी वस्तुओं और सेवाओं में अनुदान दिया जाना चाहिये। आम आदमी द्वारा ही आज की परिस्थितियों मेें सरकार की जरूरतों के लिये ज्यादा से ज्यादा टैक्स दिया जा रहा है। दूसरी ओर सरकार मदद समृद्धि के एवरेस्टों को दे रही है जैसा कोरोना में देखने को मिला जब निवेश कराने के नाम पर सरकार ने कारपोरेट जगत से अपने अरबों के बकाये को छोड दिया और टैक्स में तमाम तरह की रियायतें भी दी जबकि इसके बाद कारपोरेट जगत द्वारा  नये निवेश की मांग पर सरकार को ठेंगा दिखा दिया गया ।
       सरकार द्वारा मोहताज लोगों की बजाय समृद्धि के शिखरों को पोषित करना स्थापित नीति के सर्वथा विरूद्ध है। आज विकास के नाम पर जिन सेवा और सुविधाओं की व्यवस्था सरकार कर रही है उनका गरीबों से कोई सम्बन्ध नहीं है। एक्सप्रेसवे में भी कारपोरेट और उद्योग जगत के लिये द्रुत गति से माल पहुंचाने की सुविधा हो रही है जो उसका मुनाफा बढाने में सहायक है। आम आदमी के लिये तो उस पर लगने वाले टोल टैक्स की दरें इतनी भयावह है कि वह आसानी से इसके उपयोग की कल्पना भी नहीं कर सकता । विकास आम लोगो के लिये होता तो रियायती किराये वाली ट्रेन और बसें शुरू करायी जाती । इतना ही नहीं कारपोरेट का पूरा कारोबार गरीबों की बचत पर निर्भर कर दिया गया है जिसका उदाहरण अडाणी को बैंको से भारी कर्ज दिया जाना है जबकि बैंके किस वर्ग की डिपोजिट से चलती है यह किसी से छुपा नहीं है। इसलिये आम लोग जो अभी मोहताज स्थिति में है उन्हें रियायती दर पर बिजली देने जैसी सुविधाओं की व्यवस्था तथाकथित करदाताओं की कमाई को लुटाना नहीं है बल्कि यह सरकार के बुनियादी कर्तव्य का तकाजा है। सरकार को अगर ज्यादा आमदनी चाहिये तो आम लोगो के खून की बूंदे तक निचोडने जैसी हरकतें कराधान में छोडनी होगी और समृद्ध लोगो द्वारा की जाने वाली करों की चोरी पर अंकुश लगाकर यह काम करना होगा। प्रधानमंत्री मोदी को चाहिये कि आम लोगो की आमदनी बढाने और जब तक उनकी आय पर्याप्त न हो जाये तब तक उन्हें रियायती दरों पर बुनियादी सुविधायें देने के कदम का न केवल समर्थन करना होगा बल्कि स्वयं भी इस रास्ते को अख्तियार करना पडेगा।

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