1990 का मंडल-विरोधी आंदोलन और 1994 की घटनाएँ भारतीय समाज और प्रशासन के इतिहास में ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें अक्सर दो अलग-अलग नजरियों से देखा जाता है। एक नजरिया इन्हें आरक्षण नीति के खिलाफ जायज आक्रोश मानता है। दूसरा इन्हें संस्थाओं पर हमला और कानून-व्यवस्था के पतन के रूप में देखता है। लेकिन इन दोनों नजरियों के बीच एक तीसरा, कम चर्चा वाला पक्ष छिपा रहता है—पुलिस की स्थिति। जब आंदोलनों को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला, सड़कें और यहाँ तक कि अदालत परिसर भी भीड़ के कब्जे में चले गए, तब कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी। उस जिम्मेदारी के दौरान पुलिस को जो झेलना पड़ा, उस पर ‘उफ़’ करने तक का मौका शायद ही मिला।
यह लेख उसी चुप्पी और वर्तमान विमर्श के dual standard की पड़ताल करता है।
सामाजिक समर्थन और अराजकता का संगम
1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग लागू करने के फैसले के खिलाफ विरोध मुख्य रूप से शहरों, विश्वविद्यालयों और ऊँची जातियों के युवाओं में फैला। आत्मदाह की घटनाएँ, बसों-ट्रेनों की तोड़फोड़, सड़क जाम और पुलिस से सीधी झड़पें हुईं। कई शहरों में सेना बुलानी पड़ी। यह आंदोलन महज कुछ छात्रों का नहीं था। मध्यवर्ग, शिक्षित वर्ग और कई सामाजिक समूहों का नैतिक और सक्रिय समर्थन इसके साथ था। मीडिया कवरेज, राजनीतिक बयानबाजी और सार्वजनिक चर्चा में इसे अक्सर ‘मेधा’ और ‘योग्यता’ की रक्षा के रूप में पेश किया गया।
1994 में स्थिति और जटिल हुई। आरक्षण संबंधी बंद के दौरान 13 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में भीड़ घुस गई। मुख्य न्यायाधीश के चैंबर को नुकसान पहुँचा, वकीलों पर हमला हुआ और परिसर में गोलीबारी की नौबत आ गई। पुलिस सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई। स्थानीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का निलंबन इस विफलता का प्रशासनिक परिणाम था। उत्तराखंड क्षेत्र में ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आंदोलन भी हिंसक रूप ले चुका था, जिसमें रामपुर तिराहा जैसी घटनाएँ हुईं।
इन आंदोलनों को सामाजिक समर्थन इसलिए मिला क्योंकि वे एक बड़े वर्ग की आशंकाओं—आरक्षण से अवसरों के सिकुड़ने, योग्यता के ह्रास और सामाजिक संतुलन बिगड़ने—को छू रहे थे। लेकिन समर्थन मिलने का मतलब यह नहीं था कि हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ या संवैधानिक संस्थानों पर हमला जायज हो गया। अराजकता को सामाजिक वैधता मिल जाना ही सबसे खतरनाक पहलू था।
पुलिस को क्या झेलना पड़ा?
पुलिस दोनों तरफ से घिरी हुई थी।
एक तरफ आंदोलनकारी थे, जिन्हें सामाजिक समर्थन प्राप्त था। वे पुलिस को ‘दमनकारी’, ‘सरकारी मशीन’ या ‘आरक्षण समर्थक सत्ता का औजार’ मानते थे। लाठीचार्ज, आंसू गैस या गोलीबारी को तुरंत ‘अत्याचार’ करार दिया जाता था। दूसरी तरफ प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व पुलिस से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपेक्षा रखता था। अगर पुलिस सख्ती करती तो ‘ज्यादती’ का आरोप, अगर नरमी करती तो ‘नाकामी’ और निलंबन।
1990 में कई जगह पुलिसकर्मियों पर हमले हुए, वाहन जलाए गए, घायल हुए। 1994 में हाईकोर्ट परिसर की सुरक्षा चूक के बाद SSP का निलंबन इस बात का सबूत है कि विफलता की कीमत पुलिस अधिकारी को चुकानी पड़ी। उत्तराखंड आंदोलन में भी पुलिस को एक साथ ‘ज्यादा बल प्रयोग’ और ‘अपर्याप्त सुरक्षा’ दोनों का दोषी ठहराया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय पुलिस की कठिनाई पर सार्वजनिक सहानुभूति बहुत कम थी। आंदोलन को समर्थन देने वाला वर्ग पुलिस की मजबूरियों, संसाधनों की कमी, राजनीतिक दबाव या मैदान में झेलने वाले खतरे पर शायद ही चर्चा करता था। ‘उफ़’ करने का मौका इसलिए नहीं मिला क्योंकि सामाजिक नैरेटिव पहले से तय था—आंदोलनकारी पीड़ित, पुलिस दमनकारी।
वर्तमान विमर्श की पड़ताल
आज का विमर्श इस dual standard को और साफ दिखाता है।
जब कोई आंदोलन सत्ता या प्रमुख नैरेटिव के अनुकूल होता है, तो पुलिस की सख्ती को ‘जरूरी’ या ‘कानून का राज’ कहा जाता है। जब आंदोलन असुविधाजनक होता है, तो वही सख्ती ‘दमन’, ‘फासीवाद’ या ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ बन जाती है। 1990-94 के आरक्षण-विरोधी आंदोलनों में पुलिस पर ‘उफ़’ तक न करने देने वाली मानसिकता आज भी कई रूपों में जिंदा है।
वर्तमान चर्चाओं में अक्सर यह देखा जाता है कि:
पुलिस की कार्रवाई पर तो घंटों बहस होती है, लेकिन आंदोलन की हिंसा, तोड़फोड़ या संस्थानों पर हमले पर उतनी गहन पड़ताल नहीं होती।
सामाजिक समर्थन मिलने वाले आंदोलनों में पुलिस को ‘नियंत्रण’ का औजार मान लिया जाता है, जबकि समर्थन न मिलने वाले आंदोलनों में पुलिस को ‘उत्पीड़क’ बना दिया जाता है।
पुलिसकर्मियों के घायल होने, उनके परिवारों की स्थिति या मैदान की वास्तविक कठिनाइयों पर चर्चा न्यूनतम रहती है।
यह dual standard खतरनाक है। कानून व्यवस्था बनाए रखना किसी एक वर्ग या विचारधारा की जिम्मेदारी नहीं है। अगर समाज का एक हिस्सा आंदोलन को समर्थन देता है और साथ ही पुलिस को कठघरे में खड़ा कर देता है, तो संस्थाएँ कमजोर होती हैं। 1994 में हाईकोर्ट परिसर तक भीड़ के पहुँचने और SSP के निलंबन की घटना यही सिखाती है कि जब सामाजिक समर्थन अराजकता को वैधता दे दे, तो पुलिस अकेली पड़ जाती है।
निष्कर्ष
1990 और 1994 के आरक्षण-विरोधी आंदोलनों ने दिखाया कि सामाजिक समर्थन मिलने पर आंदोलन कितनी तेजी से अराजक रूप ले सकते हैं और संस्थाएँ कितनी आसानी से निशाने पर आ सकती हैं। उस दौरान पुलिस को दोनों तरफ से दबाव झेलना पड़ा, बिना इस बात के कि उनकी मजबूरियों पर कोई गंभीर चर्चा हो।
वर्तमान विमर्श में भी यही प्रवृत्ति दिखती है—चयनित सहानुभूति और चयनित आक्रोश। पुलिस को सिर्फ ‘दमन का औजार’ या ‘नाकामी का प्रतीक’ मानने के बजाय यह समझना जरूरी है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर समाज आंदोलन को समर्थन देता है, तो उसे हिंसा और संस्थागत हमलों की सीमा भी तय करनी चाहिए। पुलिस पर ‘उफ़’ तक न करने देने वाली मानसिकता लोकतंत्र को मजबूत नहीं करती, बल्कि संस्थाओं को कमजोर करती है।
इतिहास की यह सीख आज भी प्रासंगिक है। अराजकता को सामाजिक वैधता मिल जाए और पुलिस चुप रहने को मजबूर हो जाए, तो लोकतंत्र की नींव धीरे-धीरे खोखली होती है।






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