किताबें पुराने भवन में बदहाल, जगह के अभाव में पाठकों की दूरी; भुगतान अटकने से ठप पड़ी फिनिशिंग, विधानसभा चुनाव से पहले लोकार्पण की चुनौती
उरई (जालौन)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शिलान्यास से जुड़ी प्रतिष्ठा के बावजूद राजकीय पुस्तकालय के नए भवन का निर्माण पूरा कराने को लेकर प्रशासनिक उदासीनता अब सवालों के घेरे में है। भवन की फिनिशिंग का काम बंद पड़ा है और इसकी वजह ठेकेदार का भुगतान लालफीताशाही में अटकना बताई जा रही है। यही स्थिति बनी रही तो जिस भवन में ज्ञान और विचारों की नई दुनिया बसनी थी, वह लोकार्पण से पहले ही भुतहा खंडहर में तब्दील होने की आशंका पैदा कर सकता है।
मामला केवल एक सरकारी भवन के अधूरे निर्माण का नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक दृष्टि और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है, जिसे सरकार सार्वजनिक मंचों से अपनी प्राथमिकता बताती रही है। वर्तमान सरकार पुस्तकालय संस्कृति को बढ़ावा देने को अपने सांस्कृतिक अभियान की अहम कड़ी मानती है। किताबों की खरीद पर भी भारी-भरकम बजट खर्च किया गया है, ताकि पाठकों को समृद्ध साहित्य उपलब्ध कराने के साथ इतिहासबोध और राष्ट्रीय चेतना की नई दृष्टि विकसित की जा सके। लेकिन सरकारी योजनाओं की राह में लालफीताशाही किस तरह बाधा बनती है, उरई के राजकीय पुस्तकालय का अधूरा भवन इसकी मिसाल बनता दिख रहा है।
विडंबना यह है कि किताबों का भंडार अब भी पुराने भवन में अस्त-व्यस्त पड़ा है। जगह की कमी के कारण पाठकों को पुस्तकालय से जोड़ने की संभावनाएं सीमित हैं। जिस नए भवन में पुस्तकों को व्यवस्थित रखने, पाठकों को बेहतर सुविधाएं देने और अध्ययन का अनुकूल वातावरण तैयार करने की उम्मीद थी, वह खुद अधूरे निर्माण के कारण उपयोग में नहीं आ पा रहा है।
भवन का लोकार्पण विधानसभा चुनाव से पहले हो पाता है या नहीं, यह भी अब एक अहम सवाल बन गया है। यदि चुनाव से पहले निर्माण पूरा नहीं हुआ तो विपक्ष को मुख्यमंत्री के शिलान्यास से जुड़े इस अधूरे प्रकल्प को लेकर सरकार पर निशाना साधने का अवसर मिल सकता है। ऐसे में निर्माण कार्य पूरा कराना केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सरकार की घोषित सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को जमीन पर उतारने की कसौटी भी है।
मामला नए जिलाधिकारी के संज्ञान में लाए जाने पर उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक से निर्माणाधीन भवन की अद्यतन स्थिति की जानकारी लेने की बात कही है। अब देखना यह है कि समीक्षा के बाद निर्माण कार्य में तेजी आती है या पुस्तकालय का नया भवन फाइलों और भुगतान संबंधी अड़चनों में उलझा रहता है।
उधर, जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने इस विषय पर चर्चा के दौरान कहा कि सरकार नए बौद्धिक माहौल के निर्माण को प्राथमिकता दे रही है। उनके मुताबिक, पिछली सरकारों के दौर में राष्ट्रीय गौरव की गाथा को जिस तरह ओझल किया गया, उसके मद्देनजर राष्ट्रीय स्वाभिमान के उत्थान के लिए लेखन के क्षेत्र में नए सृजन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस चेतना के प्रसार में पुस्तकालयों की भूमिका को सरकार समझती है। उन्होंने उरई में एक समृद्ध डिजिटल पुस्तकालय के निर्माण की बात भी कही।
लेकिन डिजिटल पुस्तकालय की परिकल्पना और बौद्धिक माहौल बनाने के बड़े संकल्पों की सार्थकता तभी सामने आएगी, जब पहले से निर्माणाधीन पुस्तकालय भवन को पूरा कर जनता के लिए खोला जाए। किताबें खरीदे जाने और भवन बनाए जाने पर सरकारी धन खर्च होने के बाद भी यदि पाठकों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा, तो इस स्थिति का प्रायश्चित किया जाना जरूरी है। अब निगाहें प्रशासन पर हैं कि वह भुगतान संबंधी अड़चन दूर कर निर्माण पूरा कराने की दिशा में कितनी तेजी से कदम उठाता है।







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